रिपोर्ट

सपना मेरा यही सखी

जितेन्द्र रघुवंशी नाट्य समारोह में 24 मई , 2026 को ‘सपना मेरा यही सखी ‘ नाटक का मंचन हुआ। नाटक की शुरुआत में इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष राकेश वेदा ने जितेन्द्र रघुवंशी को याद करते किया। राजेश जोशी लिखित नाटक ‘सपना मेरा यही सखी’ के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी कि हिन्दुस्तान की चार कवियित्रियों के माध्यम से प्रतिरोध का स्वर नाटक के केंद्र में हैऔर यह एक डॉक्यू ड्रामा है।

राकेश वेदा
रचना टंडन

घटित हो रहे समय का हर पल किसी न किसी की स्मृति में अंकित हो रहा होता है। यह सच है कि कला के अनेक माध्यमों में यथा कविता,कहानी,चित्र,नृत्य या नाटक में जिनसे हम रूबरू होते हैं उसमें दुनिया में घट रही हर पल की असंख्य घटनाओं में से कुछ घटनाएं, कुछ किस्से और कुछ लोग ही दर्ज़ होते हैं पर असल में इन तमाम कलाकृतियों में सिर्फ एक घटना,किस्सा या कोई ख़ास शख़्स दर्ज़ नहीं होता बल्कि उसके बहाने देश-दुनिया की अनगिनत तारीख़ें हम तक पहुँचती हैं और हम उन्हें अपने अतीत, वर्तमान और आने वाले समय से जोड़कर देख रहे होते हैं। इस देखने की प्रक्रिया में हम बढ़ रहे होते हैं उस दिशा में जहां निखार रहे होते हैं मनुष्यता के उजले पक्ष को। मनुष्य की इसी ज़रुरत ने कला के क़रीब रखा है।

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद हम ढूंढ रहे होते हैं उस रंग को,उस छाँह को जहां हमें कोई कविता पढ़ने मिले या किसी गीत के मधुर स्वर सुनाई दें या कोई चित्र पर नज़र अटक जाए या कोई नज़ारे पर मन आ जाए या नाटक-सिनेमा से हम दिल बहला लें। दिल बहलाने का असर हम पर पड़ता है और हमारे मन-मस्तिष्क पर चल रही विचार-प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है इसी विचार – प्रक्रिया का जोड़ और परिणाम है नाटकों पर टिप्पणी लिखना।

वेदा राकेश, रचना टंडन

24 मई-2026 को चार ऐसी कवियित्रियों पर आधारित डॉक्यू-ड्रामा देखा जो अपने समय में प्रतिरोध की वो मिसालें हैं जिनकी नज़ीर हम आज भी पेश करते हैं। इन चार कवयित्रियों के माध्यम से प्रतिरोध के स्त्री स्वर को नाटक में दर्ज़ किया है चर्चित कवि, नाटककार राजेश जोशी ने जिसकी नाट्य प्रस्तुति की वेदा राकेश और रचना टंडन ने। संगीतमय प्रस्तुति के साथ उस समय की चार कवियित्रियों के जीवन के बारे में दर्शकों का सिर्फ परिचय नाटक से हुआ क्योंकि एक नाटक में एक घंटे में सब समेट पाना संभव नहीं। नाटक में जीवंत संगीत के साथ प्रस्तुति का आकर्षण और प्रभाव ख़ास रहा। निश्चित ही सुधि दर्शक जो इन कवियित्रियों को गहराई से समझना चाहेंगे तो उनकी रचनाओं तक पहुँचने की कोशिश करेंगे और यही इस नाट्य प्रस्तुति का असल हासिल होगा। फिलहाल नाटक देखने के बाद बतौर दर्शक की हैसियत से अपनी बात पर आती हूँ चार कवयित्री स्त्रियों के जीवन का कोलाज दिखाया।

वो स्त्रियां जिन्होंने अपने अस्तित्व के लिए समाज की रवायतों को छोड़ा

वो स्त्रियां जिन्होंने मुक्त होने के लिए सवाल खड़े किये

वो स्त्रियां जिन्हें सवाल के नाम पर निर्वासन मिला

वो स्त्रियां जिन्होंने परिवार,समाज से विद्रोह किया

सत्ता हमेशा से छीनने का काम करती है इस छीनने की फेहरिस्त लम्बी है पर प्रतिरोध के स्वर के आगे सब खारिज़ होता है। इन तमाम प्रतिरोधों के पीछे है पितृसत्ता जिससे हाथ छुड़ाकर दुनिया के लिए उदाहरण बनीं ललद्यद,अण्डाल,अक्क महादेवी और मीरा बाई।

पितृसत्ता देती है प्रताड़ना

पितृसत्ता का वीभत्स रूप है बलात्कार

पितृसत्ता देती है गरिमा को चोट

और

पितृसत्ता देती बतौर व्यक्ति के अहम् को चोट

हमारी सभ्यता का शर्मनाक इतिहास पितृसत्ता का इतिहास है जिसकी ललकार किसी ग्लेडियेटर् की तरह होती है जिसमें स्त्री को स्त्री के विरुद्ध लड़ाया जाता है और उन राजाओं की तरह मज़ा लिया जाता है जिनकी बदौलत रोम में ग्लेडियेटर को लड़वाकर मनोरंजन किया जाता था। जब नाटक के शुरुआत में अभिनेत्री साइमन द बोउआर को याद कर रही हैं कि ‘स्त्रियाँ पैदा नहीं होती बल्कि बनाईं जाती हैं ‘ तो ये सिलसिला बदस्तूर जारी है और इसकी परिणति में नाटक में अतीत की उन स्त्रियों को याद किया गया जो हमारी मुक्ति की आकांक्षा की पुरखिन हैं।

नाटक में अण्डाल का श्री रंगनाथ से प्रेम दिखाया है कि वयस्क होने पर भगवान श्रीरंगनाथ के लिए वे जो माला गूँथतीं, भगवान्‌ को पहनाने के पूर्व उसे स्वयं पहन लेतीं और दर्पण के सामने जाकर भगवान से पूछतीं, प्रभु, मेरे इस शृंगार को ग्रहण कर लोगे? तत्पश्चात्‌ वह माला भगवान्‌ को पहनाया करतीं।

अक्का महादेवी कन्नड़ की चर्चित कवयित्री रही। अक्का महादेवी का जन्म 12वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के कर्नाटक में हुआ। इनकी रचना को वचन कहा जाता है। इन्होने भगवान शिव को “चेन्नमल्लिकार्जुन” कहा और उनके अगाध प्रेम में डूबी। जब राजा कौशिक से विवाह हुआ तब विवाह से पूर्व तीन शर्तें रखीं जो अपने आप में प्रतिरोध की मिसाल है। इनके पति बनें राजा कौशिक ने जब जब इन शर्तों को तोड़ा तो निर्वस्त्र ही महल से बाहर निकल साधना की। शिव के ध्यान में डूबीं इन्होने गाया –

आप मुझे सुनें या न सुनें तुम्हारे लिए गाऊँगी

आप मुझे देखो या न देखो तुम्हें ही देखूंगी

आप मुझे प्रेम करो या नहीं आपके अंक में समाऊँगी

भक्ति आन्दोलन दक्षिण में छठी – सातवीं शताब्दी में शुरू हुआ जो एक ऐसा देशव्यापी जन आन्दोलन था,जिसका देश के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा । भक्ति का यह सोता दक्षिण से उत्तर की ओर आया और बाद में यह दक्षिण एशिया में विस्तारित हुआ इसमें कश्मीर भी अछूता नहीं रहा।पतंजलि, कल्हण, भामह, आनंदवर्धन, अभिनव गुप्त जैसे ज्ञानियों के साथ लल्लेश्वरी, हब्बाखातून, अरणीमाला, रूपभवानी जैसी साधिकाएं जन्म-कश्मीर के केंद्र में रहे।

ललद्यद के वाख (उनकी रचनाओं को कहा जाता है ) में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितयों का दर्शन मौजूद है उन्हें लोग मुहावरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। ललद्यद और मीरा दोनों भक्ति में डूबी पर ललद्यद परम सत्य/शिव की तलाश में मीरा की तरह मंदिरों में नहीं भटकी बल्कि एकांत में उनका अवगाहन करती हैं ,बहिर्जगत के आडम्बरों को छोड़कर वे अंतर्जगत में उनका स्मरण करती हैं। बहरहाल ललद्यद कश्मीर की साझा संस्कृति की प्रतिनिधि कवयित्री रही जिनके वाखों में आत्मशुद्धि,सदाचार और मानव-बंधुत्व ने जनमानस को आन्दोलित किया है।यहां यह उल्लेखित करते चलूँ कि अभी हाल में चर्चित कहानीकार , उपन्यासकार गीताश्री का शोधपरक उपन्यास ‘हब्बाखातून ‘ आया है।

‘ सपना मेरा यही सखी ‘नाटक के माध्यम से स्त्री के विद्रोही जीवन को उकेरा गया है जिसके माध्यम से हम पुरुषसत्तात्मक समाज की विरूपताओं , कुरूपताओं और क्षुद्रताओं को महसूस कर पाए। अतीत की हमारी इन मुक्तिकामी कवयित्रियों के साथ सफ़र के लिए लखनऊ इप्टा को मुबारक़बाद !

संगीत में साथ देते साथी कमलाकांत,ज्ञानचंद शुक्ला,सुभाष चंद्राज दिगंत सैकिया और शहज़ाद रिज़वी

2 thoughts on “सपना मेरा यही सखी

  • उषा वैरागकर आठले

    स्त्रियों का प्रतिरोध प्राचीन काल से होता रहा है, मगर इतिहास के पन्नों में उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता रहा। बौद्ध थेरी गाथाएँ फिर भी प्रकाश में आईं और भारत की अनेक भाषाओं में भक्तिकालीन कवयित्रियों की रचनाएँ भी सामने आई हैं। सुमन राजे की किताब ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ इस पहलू पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। मराठी संत कवयित्रियों की रचनाओं और व्यक्तित्व पर सुषमा देशपांडे का ‘बया दार उघड़’ भी इस पहलू का शानदार बयान करता है।

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  • मित्रा सेन मजूमदार

    इस प्रस्तुति के लिए लखनऊ इप्टा की जितनी भी सराहना की जाए वह कम हैं। बंगाल की कितनी ही लेखिकाओं ने इस मुद्दे पर अपनी लेखन के ज़रिए आवाज़ बुलंद की है जिनमें कुछेक आशापूर्णा देवी, मैत्रेयी देवी,महाश्वेता घटक,नवनीता देव सेन,मल्लिका।आज के सन्दर्भ और भी महत्वपूर्ण हैं जहाँ पैतृक ज़ायदाद पर अब बेटी का कोई अधिकार नहीं रहा। यह कैसी विडंबना हैं?

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