याद ए पुरखे

मैक्सिम गोर्की को याद करते

पढ़ना और उससे ख़ुद को जोड़कर देखना, सीखने की ऐसी कला है जो हमें मांजती है और मनुष्य होने की सीढ़ी में ऊपर ले जाती है। बन्दर से मनुष्य बनने की प्रक्रिया में बहुत कुछ छूटा तो बहुत कुछ नया जुड़ा। सभ्य होने की दिशा में बढ़ते हुए भी अपनी हिंसक प्रवृत्तियों पर विजय नहीं पाए हैं जो अक्सरहां उभरती है और हमें मनुष्यत्व की एक सीढ़ी नीचे ले आती है यानी हमारे द्वंद्व और संघर्ष के बीच ये नाज़ुक रस्सी है जिस पर हम किसी नट की तरह चलते हुए ज़हीन होने की कोशिश कर रहे होते हैं पर तिनका भर भी चोट उत्प्रेरक का काम करती है और हम आहत होकर हिंसक होने में पल भी नहीं लगाते। सभ्यता के लम्बे इतिहास में पाश्विक प्रवृत्तियों के अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं और इसी के बरअक्स मानवीय मूल्यों से भरी मिसालें भी हैं जिनकी बदौलत हम स्वयं के साथ समाज और दुनिया से अपेक्षा करते हैं कि मनुष्य की हिंसक प्रवृत्तियां विलुप्त हो जाएं।

मनुष्यता की अदम्य चाह के रास्ते में चलने वाले अनगिनत यात्रियों में से एक यात्री है मैक्सिम गोर्की जो बचपन से ही जीवन के धक्के-थपेड़े खाकर बड़े हुए। पेट के लिए उन्होंने क्या नहीं किया। लड़कपन में ही अनाथ होने के बाद नाना-नानी के घर में रहे जहां से जल्द ही बाहर का रास्ता देखना पड़ा क्योंकि नाना का काम छूट गया था। कभी चमार की दूकान,कभी अस्तबलों में घोड़ों की सेवा,कभी नानबाइयों के यहां सफ़ाई का काम तो कभी मालियों के लिए काम किया। हताश होकर आत्महत्या की कोशिश की पर ज़िंदा रह गए क्योंकि उन्हें रचना था जबकि वे किशोरावस्था तक पढ़ना भी नहीं जानते थे। पढ़ने से नफ़रत रही पर एक जहाज़ यात्रा के दौरान जहाज़ के बावर्ची ने गोर्की को अक्षर-ज्ञान करा कर मानवता की जो मिसाल कायम की कि उसके बाद गोर्की ने सिर्फ पढ़ा ही नहीं बल्कि पूरा जीवन लिखा। उनकी कालजयी रचनाएं जिनमें शामिल है माँ, मेरा बचपन ,जीवन की राहों में, मेरे विश्वविद्यालय, क्लिम सेग्मिन का जीवन,अर्तमोनफ़ के कारखाने।

मैक्सिम गोर्की जिनकी लेखनी से हम समाज की तलछट में बसे उन पात्रों तक पहुँच पाए जिनके करीब रहकर भी अनजान रहते हैं। है ना यह अजीब विडम्बना कि समाज में रची -बसी इन कड़ियों को हम नज़र-अंदाज़ कर देते हैं और ग्लानि मुक्त जीवन के मज़े उठा रहे हैं। बहरहाल मैक्सिम गोर्की की रचना – ‘वह लड़का ‘ पर लिखने से पहले इस कहानी का लिंक आपसे साझा कर रही हूँ , उसके बाद इस कहानी तक पहुँचने की बात भी दर्ज़ करती चलूँ।

https://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B5%E0%A4%B9_%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95%E0%A4%BE_/%E0%A4%AE%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%80

बच्चों के लिए ढेरों रचनाएं हैं जिन्हें पढ़ा जाना और उन्हें सुनाया जाना शेष है। पढ़ने के अभ्यास में किसी ख़ास दिन के बहाने किसी ख़ास शख़्सियत को याद करते बच्चों के साथ पढ़ने के लिए कुछ ढूंढना हो जाता है। यह भी पता है कि कोई ज़रूरी नहीं है कि वे इसे लम्बे समय तक याद रख पाएं पर कहानी सुनकर और उसके बाद उस पर हुई बात कहीं मानस में दर्ज़ हो जाए और उसके रसायन संवेदना के झरने को आबाद रखें बस इसी उम्मीद से उनके बीच कहानी पढ़ती हूँ। ऐसी रचना बच्चों के साथ पढ़ते हुए यह स्थायी भाव बन गया है कि इस यात्रा से वे भी और मैं स्वयं भी रोज़ थोड़े-थोड़े मनुष्यत्व की राह में आगे बढ़ रही हूँ। बहरहाल १८ जून मैक्सिम गोर्की को याद करने का दिन था और दो-तीन दिन से लग रहा था कि उनकी कौन सी रचना पढ़ी जाए जो छोटी भी हो और छोटे बच्चों को समझ भी आ सके इसी उहापोह में गद्यकोश में एक कहानी मिली जिसे दो बार पढ़ने के बाद लगा कि बच्चों के बीच पढ़ी जानी चाहिए।

‘वह लड़का ‘ कहानी एक गरीब, उपेक्षित और मुसीबतों से घिरे बच्चे की मार्मिक कहानी है। मासूमियत और गहरे दुःख में पड़े बच्चे की कहानी है। सरल भाषा में लिखी लघुकथा सुनाने के बाद उनसे पूछा कि जिसे जो समझ आया हो वे बोलना शुरू करें। यहां यह बताना ज़रूरी है कि हर पाठ के बाद प्रतिक्रया ज़ाहिर करने में छोटे बच्चों की तत्परता दिलखुश करती है। बड़े यानी किशोर बच्चे इस दौरान अपनी बातों को अभिव्यक्त करने के लिए धीरज रखते हैं। इस कहानी को सुनने के बाद हमेशा की तरह श्रवण ने सबसे पहले अपनी बात रखी-

श्रवण – हमको यह समझ आया कि उसके ( लडके के ) के पापा की पीठ में चोट लगी है। पिता चार पाए वाली खाट में गिरे पड़े थे उस लडके को भी उतनी ही चोट लगी थी जितना कि उसके पापा को लगी थी पर वो लड़का अपने पिता की चोट के बारे में सोचते हुए करतब दिखाकर पैसा कमाने का सोचा क्योंकि उसके घर में एक भी पैसा नहीं था। दीदी अपने यहां न जैसे कि कुछ हो जाता है तो बड़े लोग सेवा करते हैं पर वो बच्चा अपने पापा की सेवा किया ।

श्रवण

अभिषेक – उनके घर में पैसा भी नहीं था और वे लोग बहुत गरीब थे, उनकी कोई मदद ही नहीं करता था क्योंकि वो यहूदी था। उसके पापा का भी ज़ख्म था और उसको भी बहुत चोट लगी थी तब पर भी वो करतब दिखाता है। वो बहुत मेहनती था।

अभिषेक और गुंजन

अभिनव – हमें समझ आया न कि बाकी बच्चे उस लडके को गाली देते हुए भाग गए थे। उनमें जो बड़ा था वो आकर इस छोटे लडके को पैसा दिया और जब वो जाने लगा तो पता चला कि लडके को ज़ख्म हुआ है।

गुंजन – बाकी बच्चे उस लडके को जो गाली दिए तो उसको बुरा भी नहीं लगा था।

बच्चों से सवाल – अच्छा एक बात बताओ कि गाली सुनाने में भी उसे बुरा क्यों नहीं लगा तो बच्चों ने जवाब दिया –

  • इग्नोर कर दिया।

सवाल – क्यों इग्नोर किया ?

जवाब -क्योंकि वो सब बच्चे थे।

सवाल – लेकिन गाली तो बच्चों को भी बुरी लाती है ?

जवाब

  • उस बच्चे की मजबूरी थी।
  • उसकी समझदारी थी
  • उनको गाली – वाली नहीं बोलना था ( पहली पढ़ने वाले साहिल का जवाब )
  • पेट के लिए इग्नोर किया क्योंकि उसका दिमाग अपने पापा के ज़ख्म में था इसलिए गाली को ध्यान नहीं दिया ।

नम्रता – लडके को जब गाली दी गई तो उसने ध्यान नहीं दिया क्योंकि वो समझदार था और उसे अपने पिता का ध्यान था। अपनी चोट के बावजूद भी उसने करतब दिखाया।

सुरभि – इस कहानी से मेरे को भी यही समझ आया कि उस बच्चे को पापा की चोट का ध्यान ही था और कैसे भी करके पैसा जमा करके उनकी चोट को ठीक करना था। उसकी मजबूरी भी थी क्योंकि कोई सहारा भी नहीं था। जब करतब करके पैसा मांगे तो बच्चे देते नहीं पर वो गुस्सा नहीं करता। उस लडके में दुःख-दर्द है पर वो दूसरों को दिखाता नहीं है वो सबसे अच्छे से बात किया, इतना छोटा होकर भी वो समझदार लड़का था।

सवाल – क्यों समझदार हो गया था ?

जवाब – क्योंकि उसके ऊपर ज़िम्मेदारी आ गयी थी ?

सवाल – ज़िम्मेदारी कब आती है ?

जवाब – जब घर में कोई प्रॉब्लम होती है।

दिव्या – जब हम लोगों की फैमिली में प्रॉब्लम आता है तो भले ही हम लोग कम उम्र के होते हैं पर एक ज़िम्मेदारी आ जाती है और हम लोग अपने उम्र के लोगों से ज़्यादा समझदार हो जाते हैं , मैच्योर हो जाते हैं। एक ज़िम्मेदारी आ जाती है कि कैसे भी कर सब ठीक करना है। उस समय यह भी हो जाता है कि हम अपने बारे में छोड़कर अपनी फैमिली का प्रॉब्लम सॉल्व करें।

बाएं से दिव्या,श्रवण और सुरभि

सुजल – मैक्सिम गोर्की की इस कहानी में दो तरह के बच्चों को दर्शाया गया है। एक वो बच्चे हैं जो कहानी के मुख्य पात्र के साथ रहते हैं क्योंकि मुख्या पात्र को बच्चों के साथ रहना अच्छा लगता है और दूसरा बच्चा है जिसे अपने और पापा की चोट की वजह से काम करना पड़ता है।
दो तरह के बच्चे का जीवन दिखाया गया है एक जो कहानी के मुख्य पात्र के साथ के बच्चे हैं जो खेलते-कूदते हैं और दूसरे तरफ़ एक और बच्चा है जिसमें समय के साथ मैच्योरिटी आ गई है ज़िम्मेदारी आ गई है जो चोट लगने के बाद भी अपना दुःख-दर्द सब भूल के अपनी फैमिली के लिए काम कर रहा है। उसका करतब देखने वाले बच्चे उसे गाली देकर चले गए तो उसे बुरा नहीं लगा क्योंकि उसे पता है कि उसे मेहनत कर पैसे कमाने हैं बुरा लग जाने पर उसके पापा का ख़्याल कौन रखेगा इसलिए वो इस बात का बुरा नहीं माना। कहानी के मुख्य पात्र ने उस लडके को पैसे दिए। कहानी से यही सीखे कि हम लोगों को कितना भी प्रॉब्लम हो उससे डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे फेस करना चाहिए और उसी से रास्ता निकलेगा।

सामूहिक पाठ करने से सभी बच्चों की समझ से कहानी की मुकम्मल समझ की बात आ जाती है यही कहानी या कविता पाठ का हासिल होता है।

बच्चों की बातों में जब सुजल ने दो तरह के बच्चों के जीवन को दर्शाने की बात की तो गोर्की की कहानी के मूल में जिस मेहनतकश वर्ग की व्यथा उन्होंने बतानी चाही है वो स्पष्ट हो गई। गोर्की का मार्क्सवाद में गहरा यकीन था और वो उनके साहित्य में स्पष्ट झलकता है कहा भी जाता है कि साहित्य के माध्यम से अर्जित ज्ञान की उष्मा हमेशा महसूस की जा सकती है और उसे अभ्यास में लाने की कोशिश भी की जाती है।

कहानी की चर्चा के दौरान जब ज़िम्मेदारी की बात आई तो उन्हें कहा कि तुम सभी में ज़िम्मेदारी तब आएगी जब तुम्हें लगेगा कि पढ़ना ज़रूरी है। जिस दिन लगेगा कि ख़ुद के लिए पढ़ना ज़रूरी है उस दिन समझ लेना कि तुम सब ज़िम्मेदार हो गए। जैसे यहां कुछ बच्चे धीरे – धीरे अपने से किताब पढ़ रहे हैं तो वे भी ज़िम्मेदार होते जा रहे हैं। पढ़ने के अलावा भी बहुत से काम है जिनके लिए हो सकता है तुम सब ज़िम्मेदार हो गए हो जैसे मुझे लगता है कि हम लोगों को मिलकर कहानी-कविता पढ़ना ज़रूरी है तो तुम सब मान सकते हो कि दीदी भी थोड़ी ज़िम्मेदार हो गई है।

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