बाल रंग कार्यशाला

ख़्वाजा अहमद अब्बास की याद में (कार्यशाला डायरी -१)

जमशेदपुर इप्टा की पांचवीं कार्यशाला का अनुभव शानदार रहा।ख़्वाजा अहमद अब्बास की याद में  1 से 7 जून, 2026 को धातकीडीह कम्युनिटी सेंटर में भारतीय जननाट्य संघ, जमशेदपुर ने सात दिवसीय बालरंग कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला को नाचा शैली पर केंद्रित किया गया जिसके लिए हमारे बीच नाचा शैली के सुपरिचित अभिनेता और निर्देशक निसार अली आए। निसार अली ने हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘ उखड़े खंभे ‘ का नाट्य रूपांतरण और  निर्देशन किया।

कार्यशाला में कुल 25 प्रतिभागी बच्चों ने भाग लिया । कार्यशाला में कुल 25 प्रतिभागी बच्चों में 12 नए बच्चे आए जिन्होंने पहली बार थियेटर की कार्यशाला की।

समापन समारोह में गीत प्रस्तुत करते प्रतिभागी

सुबह छह से दोपहर बारह बजे तक चलने वाली कार्यशाला में बच्चों ने गीत, नृत्य और नाटक की बुनियादी बातें सीखीं। सुबह फिजिकल एक्सरसाइज के बाद अलंकार का अभ्यास और उसके बाद गीत सीखा । हमारी कोशिश होती है कि धीरे धीरे बच्चों को गीत सिखाया जाए जिससे वो उन्हें कंठस्थ हो जाए। सुबह की फिजिकल एक्सेरसाइज़ और संगीत के लिए साथी पार्थो बनर्जी ने भूमिका निभाई। इप्टा का गीत ‘ तू ज़िंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर ‘और नज़ीर अकबराबादी का ‘ रोटीनामा ‘ सीखा। यहां यह उल्लेखित करती चलूँ कि नज़ीर अकबराबादी की इस नज़्म को ‘ द अम्ब्रेला क्रिएशंस ‘ ने ध्वन्यांकन और वीडियो किया है जो यूट्यूब में उपलब्ध है।

कार्यशाला में बच्चों ने तीन नृत्य का प्रशिक्षण तीन प्रशिक्षकों के माध्यम से लिया। इप्टा के साथी जीवन यदु के छत्तीसगढ़ी गीत अत्याचारी राज करे नय्यो जादा दिन, ‘ हाय रे सरगुजा नाचे ‘ पर करमा नृत्य और स्वानंद किरकिरे के ‘ ओ री चिरैया ‘ पर नृत्य की प्रस्तुति क्रमशः श्वेता गुप्ता, उर्मिला हांसदा और दिव्या हरपाल ने तैयार कराया।

हमने इस बार नाटक के प्रशिक्षण के लिए रायपुर से निसार अली को आमंत्रित किया था जो पिछले 40 बरस से नाचा गम्मत के प्रचार – प्रसार में लगे हुए हैं। हंसते-हंसते रोना और रोते-रोते हँसना नाचा के मूल में है। हास्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर कटाक्ष और अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को ज़ाहिर करना नाचा की आत्मा है।

कार्यशाला प्रशिक्षक निसार अली

नाटक में चलना, बोलना और अभिनय करना सिखाने की सभी नाट्य निर्देशकों की अपनी शैली होती है निसार अली ने बच्चों को विभिन्न गतिविधियों के जरिए नाटक के लिए तैयार किया और उसके बाद अलग-अलग दृश्य बनाने के बाद बच्चों को कार्यशाला में तैयार किए जाने वाले नाटक से परिचित कराया जिससे बच्चे स्क्रिप्ट और संवाद में उलझे नहीं क्योंकि पूर्व में मूवमेंट्स और वॉइस प्रोजेक्शन पर उन्होंने गतिविधियों के जरिये काम कर लिया।बच्चों में से तय किए पात्र भी अलग अलग दिन रिहर्सल करवा के देखने के बाद मुफ़ीद प्रतिभागी को उसके रोल में फिक्स किया।

इस बार हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘ उखड़े खंभे ‘ का मंचन किया गया जिसका शानदार नाट्य रूपांतरण निसार अली ने किया है। नाचा शैली में व्यंग्य और हास्य का ग़ज़ब मिश्रण होता है और इसके लिए परसाई से बेहतर कौन हो सकते हैं। बच्चे कार्यशाला में इस नाटक के माध्यम से हरिशंकर परसाई से परिचित हुए।

कार्यशाला के समापन समारोह में इस बार मो. ज़करिया, डॉक्टर एस के झा, शांति घोष,अंजलि बोस और रांची से रणेन्द्र जी, मिथिलेश जी, पंकज मित्र, कमल जी, एडिटर पोस्ट के एडिटर मुस्तकीम आलम, इबरार भाई, डाल्टनगंज से उपेन्द्र भैया के अलावा जमशेदपुर शहर के प्रबुद्धजन पधारे।

डॉ एस के झा,कॉमरेड शशि और मो. ज़करिया

नाटक में प्रयोग की गई प्रॉपर्टी को तैयार करने में रामचंद्र मार्डी, उर्मिला हांसदा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें सहयोग किया प्रदीप रजक ने। कार्यशाला के प्रबन्धन में अंजना का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

बाएं से प्रशान्त,अर्पिता,संजय सोलोमन,अहमद बद्र,डॉ देवदूत सोरेन,उपेन्द्र मिश्रा,मुस्तकीम आलं,गौतम बोस

कार्यशाला को सुनियोजित तरीके से चलाने के दबाव के बावजूद जब बच्चों को बेफ़िक्र देखते हैं तो हौसला बढ़ जाता है। बच्चे कार्यशाला को बहुत एन्जॉय करते हैं उनकी ऊर्जा देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है। कार्यशाला वो स्पेस होता है जहां बच्चे सामूहिकता और दोस्तियों के मायने सीखते हैं। घर से निकलकर वे रचनात्मक तारीख से अनुशासित होना और अपने दायरे को विस्तार देते हैं जो कार्यशाला का हासिल होता है।

कार्यशाला के अंतिम दिन प्रतिभागियों से मुख़ातिब होते उपेन्द्र भईया
कार्यशाला में आए कॉमरेड शशि और अरविन्द भैया
संपान समारोह में उपस्थित दर्शक

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *