रिपोर्ट

आदिवासी जीवन के संघर्ष के ताप की प्रस्तुति – गोह

मुंबई जहां से आधुनिक थियेटर आकार लेता है जहां से थियेटर के विस्तार की संभावना की तरफ हम आँख उठाकर देखते हैं जहां से इप्टा ने अपनी यात्रा 1943 में शुरू की और आज तक यह यात्रा निरंतर जारी है उस शहर मुंबई में इप्टा द्वारा आयोजित जितेंद्र रघुवंशी राष्ट्रीय बहुभाषीय नाट्य समारोह के पहले दिन दिल्ली और तमिलनाडु के नाटकों की प्रस्तुति हुई। सात दिन चलने वाले इस फेस्टिवल के पहले दिन में दिल्ली जे एन यू इप्टा और तमिलनाडु इप्टा की प्रस्तुति सम्पन्न हुई।

२२ मई,२०२६ को दिल्ली जे एन यू इप्टा का नाटक ‘गोह’ देखा जिसमें वंदना टेटे, जसिंता केरकेटटा और अनुज लुगुन की कविताओं की प्रस्तुति हुई। झारखंड के तीन आदिवासी कवियों की कविताओं की ज़मीन हमें उस दुनिया में ले जाती है जहाँ भूगोल में बंधा कोई गाँव,कोई देश नहीं है बल्कि यह भूगोल में बंधी सीमाओं को तोड़कर दुनिया के सभी आदिवासियों को संबोधित कविताएं हैं जिनमें उनके जीवन की संस्कृति, मिथक, रहन-सहन से लेकर पर्यावरण को बचाने की लड़ाई,प्राकृतिक साहचर्य के विछोह,विस्थापन,संस्कृति पर होने वाले हमले के साथ उनके पुरखों का संघर्ष गुँथा है। आदिवासियों की जिस पहचान की निशानदेही हम सीमित समझ में करते हैं ये कविताएं हमारे उस भ्रम को भी तोड़ती हैं।

कविता को अर्थपूर्ण दृश्य विधान से मंचित करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना कविताओं का चयन। वंदना टेटे,जसिंता केरकेटटा और अनुज लुगुन की कविताओं को आदिवासियों की संस्कृति और संघर्ष में एक क्रमबद्धता महसूस होती है और यही पूरी नाट्य प्रस्तुति की खूबी रही । नाट्य प्रस्तुति में नाल की थाप के साथ जब वंदना टेटे की कविता के साथ कलाकारों का प्रवेश होता है वही पूरे नाटक के मिजाज़ को बयां करता है-

ओ माकी
सरई के पत्ते
फुला गए हैं
रेशम के कोये में
अंडे खदबदा रहे हैं
बिरसा से कहना
अभी भी होती है पत्थलगड़ी
हम अभी भी करते हैं
एरा सेंदरा (जनी शिकार )
दिसुम में हर बिहान
आज भी है उलगुलान

जब कविता बिरसा को याद करते हुए सरई/सखुआ के फूलने की बात कर रही है, जब कविता पत्थलगड़ी की बात कर रही है तब एक ही समय में आदिवासी संस्कृति, प्रकृतिऔर संघर्ष की बात कर रही है। हज़ारों साल पूर्व शुरू किये गए पत्थर स्मारकों की परम्परा आज भी झारखंड के भूमिज, मुंडा और हो समुदाय में प्रचलित है। मृतकों की याद संजोने,अपने अधिकार क्षेत्र के सीमांकन और सामूहिक मान्यताों को सार्वजनिक करने की परम्परा पत्थलगड़ी है।

आदिवासियों की परम्पराओं में घुसते घुसपैठियों के लिए अजनबियों से सवाल है कि किस तरह वे हमारी प्रकृति को लील रहा है, नदियों , पहाड़ों और जंगलों को नष्ट कर रहा है। आदिवासियों के जीवन में सांस की तरह कुदरत की हर धड़कन रची-बसी है जिसकी धीमी पगध्वनि उसकी साँसों के साथ जज़्ब है जिसमें उनके दैनिक जीवन,उत्सव,उल्लास और संघर्ष के किस्से गुंथे है। हम इनमें जंगल की हर वनस्पति,जीव-जंतु ,पहाड़,नदियों और ज़मीन के स्पंदन को महसूस कर सकते हैं।

इप्टा जे एन यू दिल्ली ने लगभग १२ से १४ कविताओं के माध्यम से दृश्य विधान रचकर आदिवासियत के साथ जल – जंगल ज़मीन बचाने के संघर्ष के जद्दोजेहद को रचा। इसमें मनुष्य होने और मनुष्यता के लिए चिंता के सभी धूसर रंग जो हमें हमारी हरियाली से वंचित कर रहे हैं उसकी पुकार है –

तथाकथित विकास के साथ नष्ट होते पर्यावरण के प्रति चिंता

तथाकथित विकास के साथ कुदरत के विनाश की चिंता

तथाकथित विकास के साथ संस्कृति,भाषा की विलुप्ति की चिंता

तथाकथित विनाश के साथ अमानुषिक होने की चिंता

बहुत कम प्रॉपर्टी के साथ मंच में प्रस्तुति कठिन काम है पर यह भी सच है कि अभिनय में अभिनेता का शरीर नाटक को प्रस्तुत करने में मुकम्मल होता है और इसकी कोशिश की गई इस नाटक में। दृश्य विधान को चित्रों के माध्यम से स्मृति में दर्ज़ – रस्सी द्वारा किले के कंगूरे,ज़िंदगी से जूझती आदिवासी स्त्रियां, संघर्ष के लिए उठ खड़े होना, पलाश फूलों के साथ विद्रोह और उल्लास।

जब नाटक का नाम देखा और सूना ‘गोह ‘ तो बचपन में राजा की सुनीं कहानी में उपस्थित गोह की याद आई जो दुश्मन के किले को फतह करने के लिए सैनिक इस्तेमाल करते थे। झारखंड आने के बाद आदिवासियों के बारे में सीखने और जानने के क्रम में इस शांत जीव और आदिवासी के साथ सम्बन्ध और साहचर्य की जानकारी हुई जो बहुत गहरी सुखद अनुभूति से भर दी। जीवन में प्रकृति के साथ साहचर्य के ऐसे कई जीते – जागते प्रतीक हमें आदिवासी जीवन में मिलेंगे जो नदी के पानी में उपस्थित ऑक्सीजन सा है जिसे आप उनके साथ रहकर महसूस कर पाएंगे। इस कविता नाट्य प्रस्तुति के लिए जिसमें केंद्रीय विषय पर्यावरण के इर्दगिर्द मौजूद तमाम बातों के साथ पूरा आदिवासी जीवन समाया है उसके लिए मेरी समझ में ‘गोह ‘ से बेहतर शीर्षक कोई और नहीं हो सकता था।

सामूहिक डिज़ाइन एवं निर्देशन की इस प्रस्तुति में मंच पर थे – वर्षा आनंद, तरुणी मिश्रा, रमेश देव पांडे, वागेश पवैजा, जितेंद्र कुमार, रजनीश साहिल, पम्मी अंशु केरकेट्टा, इन्द्रदीप सेन, अनुला मालाकार, माधुरी सिंह और शिवांगी। प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन – मनीष श्रीवास्तव का, वाद्य-वादन – रमेश देव पांडे, जितेंद्र कुमार तथा वागेश पवैजा, दृश्य-रचना – रजनीश साहिल, रिहर्सल सहायक थे – संतोष कुमार, साजिद, ईशान और योगेश।

कविताओं की प्रस्तुति के माध्यम से आदिवासी जीवन में रचे-बसे उन मुहावरों को सामने लाना इस नाटक की बड़ी उपलब्धि है जिन्हें हम नहीं जानते और उनके सांस्कृतिक पक्ष से अनभिज्ञ हैं।कविताओं के पाठक साहित्य पढ़ने वाले होते हैं पर जब इन्हें कला के विविध माध्यम यथा पोस्टर या प्रिंट माध्यम, कविता पाठ के वीडियो , गीतों की तरह गाये जाने या नाटक के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो इसकी पहुंच उन तक हो जाती है जहां इन्हें पढ़ा नहीं गया। किसी बात को प्रस्तुत करने के लिए नाटक में सिर्फ कहानियां नहीं होती बल्कि कवितायें भी मौजूद हैं जो किसी बात को कहने के अंदाज़ को लम्बे समय तक याद रखने में सहायक हो सकती हैं। संभावना यह भी बढ़ जाती है कि कविता की नाट्य प्रस्तुति देखकर उन कवियों के प्रति दर्शक का राग बढ़ें या कवितायेँ पढ़ने की चाह जगे बहरहाल इप्टा दिल्ली जे एन यू इप्टा की टीम के प्रयोग और प्रस्तुति को हमारी मुबारक़बाद।

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