प्रेमचंद का किस्सा ‘मंत्र’ वाया नन्हें पाठक
जीवन का उत्सव हो या अभाव सब कुछ प्रेमचंद के रचना संसार में मिलेगा। इस रचना संसार से बहुत कुछ ग्रहण करते हम पढ़ने का सलीका सीखते हैं और अपने समय – समाज की धड़कन उनकी रचनाओं के माध्यम से महसूस करते हैं। इस एहसास से गुज़रने के लिए नई पौध तैयार है जिन्हें धीरे – धीरे एक-एक, दो-दो कहानियों से गुज़रने, महसूस करने और ख़ुद में जज़्ब कर लेने की कोशिश हर उस जगह में हो रही है जहां साहित्य का हाथ थाम मनुष्यता की आदिम चाह में दुनिया रची जा रही है। अलग-अलग समय, भूगोल और भाषा में इस तरह से अपने पुरखे को पढ़ा जानना और गुना जाना ही उनको सही मायनों में याद किया जाना होगा।
आप सबने भी मंत्र कहानी पढ़ी होगी और उसे समझने में कहीं कोई परेशानी नहीं आई होगी। आज उन पाठकों के बीच यह कहानी पढ़ी जो अभी अपने बचपन की दहलीज़ पर अपनी दुनिया में मस्त हैं पर इसके साथ यह जोड़ना भी आवश्यक है कि जब भी उनके साथ सामूहिक पाठ में कोई रचना पढ़ी जाती है तो उनके मिज़ाज को देख आप अंदाज़ नहीं लगा सकते कि उनकी उम्र अभी आठ-नौ-दस-बारह-चौदह या सोलह बरस की होगी और उनके इस मिज़ाज से रूबरू होने के लिए कोशिश रहती है कि लगातार पठन-पाठन की प्रक्रिया चलती रहे इस प्रक्रिया में लिटिल इप्टा के साथी शामिल हुए जिनकी एक छवि साझा कर रही हूँ जो स्थानीय जुबली पार्क की है।
फिलहाल मंत्र कहानी पढ़ने के बाद आई उन बच्चों की प्रतिक्रिया दर्ज़ कर रही हूँ –

गुंजन – जो भगत थे न, उनको न डॉ के बेटे को देखने जाने का मन नहीं कर रहा था पर फिर भी गए थे।
सवाल – क्यों गए थे वो डॉ. चड्ढा के यहां ?
गुंजन – क्योंकि वो उनकी मदद करना चाहते थे।
साहिल – हमको समझ आया न कि वो जो डॉ. थे न उनके बेटे को सांप ने इसलिए काटा क्योंकि उसने उसका गला दबा दिया था और उसे काटने के बाद सांप भाग गया। कहानी में ये हुआ कि उसको ( भगत ) को जाने का मन नहीं था पर वो जा रहा था। उसका मन उसे बोल रहा था कि जाओ,जाओ चड्ढा के घर।
सवाल – क्यों उसका मन बार-बार चड्ढा के घर जाने को कह रहा था?
साहिल – क्योंकि उसके बेटे को सांप ने काट दिया था।
अभिषेक – मुझे समझ आया कि सबकी मदद करनी चाहिए। जैसे कि डॉ चड्ढा उसकी (भगत) की मदद नहीं किया पर उसका मन उसे बार-बार कहा कि वो वहाँ चले जाए और उसे बचा ले। कहानी में ये अच्छा लगा न कि जन्मदिन में डॉ के बेटे कैलाश को कोई एक झन बुलाता तो वो उसके पास जाता और फिर कोई दूसरा आवाज़ देकर बुला लेता, उसके दोस्त उसे आवाज़ देकर बुला रहे थे ये बहुत अच्छा लगा।
श्रवण – हमको समझ में आया न कि उस लडके (कैलाश) को सांप पालने का बहुत शौक था वो सांप के बारे में बहुत जानता था। एक गो और संपेरा था वो उसे सांप के बारे में समझा दिया। ( अपनी भाषा में जब एक जन बोलना होता है तो एक गो आदमी या एक झन शब्द का प्रयोग बच्चे करते हैं)
नम्रता – हम जिसके साथ जैसा करेंगे वैसा होगा लेकिन वो जो बुड्ढा था उसका मन बोल रहा था कि वहां नहीं जाएंगे पर तब पर भी वो अपने मन के विरुद्ध गया और डॉ के बेटे को बचाया । सबसे पहले में था न इससे यह समझ में आया न कि आप जिसके साथ जैसा भी करें पर अगर वो चाहे तो आपके साथ अच्छा करना चाहे तो कर सकता है और जो नहीं करना चाहे वो नहीं कर सकता है।
सवाल – ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए ?
नम्रता – हमको सही काम करना चाहिए।
सुरभि – सबसे पहले ये समझ आया कि जो जैसा करता है वो वैसा पायेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है। इस कहानी में वो ( भगत) जाकर हेल्प करता है। उस लडके ( कैलाश ) को पता रहता है कि सांप के दांत लगने से क्या हो सकता है फिर भी वो ज़िद्द में आकर दिखाता है और अपनी जान दे देता है।
डॉ अपने अपने मनोरंजन के बारे में पहले सोचे और यह नहीं सोचे कि इससे किसी की जान जा सकती है, भगत कितना गिड़गिड़ाए उनके सामने कि उनका बेटा मर सकता है फिर भी वो अपने मनोरंजन के लिए चले गए और बाद में उनके साथ भी वैसा होता है। बूढ़े को पता चलता है कि डॉ के बेटे के साथ क्या हुआ है तो बूढ़ा दिखावे के लिए सोचते हैं कि अच्छा हुआ लेकिन उनके मन में जो सच्चाई थी जिसकी वजह से उन्हें बुरा लग रहा था लेकिन वो दूसरों को दिखाने के चक्कर में जा नहीं रहे थे पर उनका मन बोल रहा था कि तुम जाओ और वो जाते हैं। उन्होंने उस समय यह नहीं सोचा कि हम उसके साथ वैसा करें जैसा कि उन्होंने उसके साथ किया था। वो सोचते हैं कि उन्हें दूसरों की हेल्प करनी चाहिए।
सुजल – इस कहानी में भगत और डॉ चड्ढा दो कैरेक्टर थे उनमें दो पार्ट दिखाया है कि चढ्ढा अमीर रहते हैं और अपना मनोरंजन पहले रखते हैं और डॉक्टर होते हुए भी किसी की लाइफ को बाद में रखते हैं। दूसरे भगत को दिखाया गया है जो बूढ़े हैं और अंत में दिखाए है कि वे बूढ़े हो गए हैं और वे ऊपर से दिखाते हैं कि उन्हें कुछ चिंता नहीं है फिर भी अंदर में लगता है कि उन्हें जाना चाहिए क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उनका काम है। जाने का मन नहीं था फिर भी गए। इसमें यही दिखाया गया है कि जिनके पास पैसा-पावर रहता है वे अपने मनोरंजन में ही अंधे हो जाते हैं, इंसान होने का भाव खत्म हो जाता है। इंसानियत खत्म हो जाती है लेकिन दूसरी तरफ यह दिखाया है कि जो लोग प्रॉब्लम से जुड़े होते हैं उस प्रॉब्लम में सफ़र करते हैं वो अच्छे से समझ पाते हैं।
वर्षा – एक इंसान होने के नाते और एक डॉक्टर होने के नाते एक रेस्पोंसबिलिटी होती है वो है मदद करना। चाहे कुछ भी हो आपके लिए क्या ज़रूरी है यह आपको चूज़ करना होता है कि आपके लिए मनोरंजन ज़रूरी है या किसी की जान बचाना ज़रूरी है। सबसे पहले तो इसमें यही दिखाया है कि एक डॉक्टर की ज़िम्मेदारी क्या है जिसे वो नहीं निभाए उनको अपनी रूटीन ज़रूरी लगी और मनोरंजन किया। सात साल का बच्चा है वो मरने वाला है अगर डॉक्टर चाहते तो उसे बचाने की कोशिश कर सकते थे जैसे कि बाद में भगत ने आकर किया जबकि उनको भी पता था कि चांस कहीं न कहीं ५०-५० % होता है ये उनके मन में भी था। उनका मन कुछ और कह रहा था और दिमाग कुछ और बोल रहा था । दिमाग कह रहा था कि बदला लेना है ,जो हो रहा है अच्छा हो रहा है । डॉक्टर के साथ भी वैसा ही होना चाहिए जैसा उसे भुगतना पड़ा लेकिन उनका मन उनके उसूलों के ख़िलाफ़ था । उनका मन उन्हें खींचकर लेकर उस लडके को बचाने के लिए गया।
ज़रूरी बात यह है कि जानवरों के साथ कुछ भी अगर करते हैं तो बहुत प्रोफ़ेशनलिज़्म होना चाहिए तो एज़ ए प्रोफेशनल वो साँपों का काम तो नहीं कर रहा था। संपेरे भी प्रोफेशनल नहीं होते हैं । जानवरों को हम प्रेडिक्ट नहीं कर सकते कि कब क्या हो रहा है। आप उनके साथ थोड़ा भी इधर – उधर करेंगे तो कुछ भी हो सकता है क्योंकि जानवर का कब कैसा मूड हो रहा है कुछ नहीं जान सकते । सबसे पहल सवाल वहीं लगा जाता है जब सांप के साथ खिलवाड़ किया गया। ये शौक-वौक और इतना अजीब शौक नहीं रखना चाहिए क्योंकि जानवरों के साथ समझ का रिश्ता नहीं बन सकता बड़ा ट्विस्टेड रहता है। कुत्तों के साथ हम रहते हैं और वे भी एक सीमा के बाद कभी भी काट देते हैं फिर सांप तो खतरनाक होते ही हैं इसलिए उन पर विश्वास कर ही नहीं सकते हैं और उसके ऊपर से सांप का गला दबाया तो वो उसको एक्सप्लॉइट किया, अपने मनोरंजन के लिए किया तो वो नकारात्मक पक्ष है ही।
इतनी बात करने के बाद बच्चों से इस बारे में भी चर्चा की कि जैसे हर व्यक्ति का अपना स्पेस होता है , रहने की जगह होती है बिलकुल वैसा ही जानवरों का भी अपना प्राकृतिक आवास होता है जिसे हम मनुष्यों ने उनसे छीना है एक तो उनकी आज़ादी छीनी और अपने शौक के लिए घरों रखा दूसरा जंगल नष्ट किया। छोटे बच्चों से सवाल किया –
सवाल – चिड़िया या बन्दर तुम्हें अपने साथ रहने कहेंगे तो क्या तुम रहोगे ?
जवाब – नहीं रहेंगे।
सवाल – तुम्हें शेर कहे कि मेरे साथ गुफा में रहो तो क्या आप रहोगे?
जवाब – नहीं।
उनसे कहा कि हम मनुष्य अपने मनोरंजन,अकेलेपन और कई बार दिखावे के लिए जानवरों को अपने घरों में क़ैद करते हैं जो कि ग़लत है। ये इसलिए भी ग़लत है क्योंकि जब वो अपने प्राकृतिक आवास में रहेंगे तो चिड़िया पेड़ में,मछली नदी – तालाब में रहेंगी और अपने जैसे जानवरों के सहजीवन , सहअस्तित्व के साथ उपस्थित रहेंगी। हम उन्हें अपने जैसे बनाने की कोशिश में उन्हें उनके अपने परिवार से जुदा कर देते हैं उनकी आज़ादी छीन लेते हैं, हम उन्हें कितना भी प्यार करें उनका ध्यान रखें पर उन्हें पूरा समझने का दावा नहीं कर सकते। हममें से जो भी जानवर पालते हैं उसके पीछे सिर्फ़ स्वयं की खुशी और शौक होता है और कुछ नहीं। हम उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में जाकर देखकर खुश हों , मन बहलायें वो अलग बात है लेकिन अपने पास रखने से हम अपने शक्तिशाली होने को अभिव्यक्त कर रहे होते हैं। फिर इस कहानी में तो सांप के बारे में प्रेमचंद ने बताया। इस तरह के खतरनाक शौक को शौक नहीं कहा जा सकता।
हम सभी हर बार इस कोशिश में रहते हैं कि प्रेमचंद को याद करने में अपनी तरफ से कोई रचनात्मकता लाएँ , निश्चित ही अपनी रचनात्मकता के लिए यह समझा जाना कि हमसे पहले किसी ने नहीं किया होगा एक भोली सी-प्यारी सी भूल होगी जिसके दोहराये जाने की और दर्ज़ किये जाने की ज़रुरत हमेशा रहेगी। याद करने के क्रम में हर बार हम कुछ नया पा लेने की खुशी से अभिभूत होते हैं और यही भावना और हासिल इसका उद्देश्य होता है। एक लगातार जब हम आयोजनों में लगे होते हैं तो ऊर्जा मिलती है पर कई बार लगता है थोड़ा ठहरकर भी चिन्तन-मनन किया जाए जिससे आगे बढ़ने की चाल तेज़ की जा सके इसी ऊर्जा को पाने के लिए जब – जब बच्चों के बीच बैठकर पढ़ा जाता है उतनी बार किसी ताज़े फूल सा खिल जाने की खुशी से भर जाती हूँ और वही हासिल हुआ प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ पढ़कर।
प्रेमचंद को याद करने में चमकते मंचों में प्रेमचंद के उसूल और मूल्यों को किनारे किये जाने वाले सुशोभित होते हैं जिनके दावों में ईमानदारी के उलट स्वर की गूँज साथ चले आती है क्योंकि लिखना-रचना वो मिट्टी है जिस पर जीवन मूल्यों और उसके अभ्यास की ईमानदारी की गूंथ दिखाई देती है उस मिट्टी में कहीं से कोई दरक दिखती नहीं और न ही उसे स्वीकार्य के लिए भोंपू बजाकर प्रदर्शनी की दरकार होती है। आज के समय में जब सब कुछ विज्ञापन में बदला जा चुका है और हम-आप भी उस माया में बंधे अपने आप को विज्ञापित करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं ऐसे समय में प्रेमचंद को ताबीज़ की तरह बांधे जाने की ज़रुरत है जिन्होंने अपने लेखकीय दायित्व के प्रति प्रतिबद्धता से समझौता नहीं किया पर यह विडम्बना है कि हम बाज़ार-पूंजी के बनाये नियमों से संचालित / अभिचालित होने में अपने ज्ञान की सीमा को आंकते हैं। तकनीकी उन्नाति के हर परिवर्तन पर ख़ुद को झोंकने की ज़रुरत ज़्यादा समझते हैं बनिस्बत मनुष्य होने के लिए संवेदनशीलता के जो कि आज के समय में सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्रिया होनी चाहिए जिसमें दुनिया के कई पुरखे लेखकों , कवियों की रचनाएं हैं जो हमें मनुष्य होने की सजगता की दृष्टि देती हैं इसी में प्रेमचंद को पढ़ा जाना-गुना जाना और समझा जाना हमारी ज़रूरत है जिससे हम मनुष्यता की तरफ़ बढ़ने की दिशा से भटके नहीं।
