रिपोर्ट

नाटक के साथ सतत चलता दर्शन

थाली का बैगन नाटक का दृश्य

नाटक देखते हुए अक्सर ही हम अपने आसपास की कहानियों को जोड़कर देख रहे होते हैं। नाटक के चरित्रों में हमें अक्सर ही अपने जीवन से जुड़े लोगों की झलक मिलती है और कभी किसी नए चरित्र से परिचय होता है और हम लालायित हो जाते हैं कि आख़िर नाटककार या निर्देशक ने कहां से ऐसा चरित्र गढ़ा और हम तक पहुंचाया। यथार्थ और कल्पना के साथ रचे गए चरित्र और कहानियों से ख़ुद को जोड़कर देखने और महसूस करने की मनोरंजन करने की क्रिया में कहीं जुड़ रही होती है अतीत की कड़ियां, तत्कालीन समय की थाप और आने वाले समय की पदचाप।
हम नाटक में जो रच रहे होते हैं उसके पीछे चलती है वो विचार प्रक्रिया जिसके बूते हम स्क्रिप्ट का चयन करते हैं । कितना ही हम कह लें कि आज के दौर में फलां विषय पर नाटक किए जाने चाहिए, फलां मुद्दे को सामने लाना चाहिए पर नाटककार और निर्देशक इन बातों के प्रति अपनी उत्तेजित प्रक्रिया नहीं देते और न ही वो मुक्त स्पेस बनाते हैं जिसमें कोई आसानी से दाख़िल हो जाए क्योंकि कला रचने, बयां करने की कितनी ही फिक्स परिधि और व्याकरण हम बना दें वे हर बार कुछ नया रचते चले जाते हैं और अपनी लेखनी और प्रस्तुति की कलात्मकता और रचनात्मकता के जरिए दर्शकों को मजबूर करते हैं कि प्रस्तुति के माध्यम से आप अपने कला मानस को उर्वर करें और तमाम विमर्श को विस्तार दें।
ऊपर लिखी बातें  बतौर नाटक के दर्शक लिख पा रही हूं इस पर सहमति, असहमति संभावित है और यही थियेटर या कला माध्यम की ज़मीन है जिसमें संभावनाओं के असीमित रूप, विचार, विमर्श मौजूद हैं। ज़रूरत है उन्हें महसूस कर दर्ज़ करने की।


बहरहाल आते हैं 26 मई, 2026 को जितेन्द्र रघुवंशी नाट्य समारोह के सातवें दिन दो नाट्य प्रस्तुतियों पर अपनी बात रखने पर। दो राज्य ओड़िशा और राजस्थान जिनकी बोली-बानी और संस्कृति में स्पष्ट अंतर है। पड़ोसी नहीं होने की वजह से संस्कृतिक आदान-प्रदान की भी आसानी नहीं है फिर भी एक मंच पर कटक की ओड़िया ( ओडिशा में अलग – अलग क्षेत्रों में बोले जाने वाली ओड़िया में अंतर होता है) और राजस्थान ( जोधपुर) का हिन्दी नाटक एक ही दिन देखने मिला जिसका पूरा श्रेय नाट्य मंच और इप्टा को जाता है ।  

ओड़िया नाटक ‘एक नुवा सकलारा अपेख्या रे ‘ का दृश्य


पहला नाटक आज के समय में गांधी के दर्शन को बयां करता है और अहिंसा की ताक़त का एहसास नाटक के माध्यम से कराता है। सच है कि हिंसा हमें रक्तपात और ज़ख्म के देती क्या है। आज जब दुनिया के अलग अलग हिस्सों में हम युद्ध और हिंसा का तांडव देख रहे हैं तब हमें गांधी क्यों याद आ रहे हैं यह नाटक इसका एक छोटा सा उदाहरण है। नाटक के चरित्र शुभकांत (भ्रष्टाचारी नेता) और पंकज ( आर्म्ड  रिवॉल्यूशन में यकीं करने वाला) के माध्यम से उपजी आशंका, चिन्ता, अंधाधुंध चाह और महत्वाकांक्षा के लिए कोई वाज़िब तर्क नहीं है। लिप्सा, घृणा, आतंक और भ्रष्टाचार को दुनिया का हर दर्शन और विचार का खांचा ख़ारिज़ करते हैं इसलिए गांधी दर्शन की तरफ दुनिया उम्मीदी से देख रही है और इस विचार के केंद्र में रखकर नाटककार ने यह नाटक लिखा है। इस नाटक के केंद्र में गांधी दर्शन हैं और उसके इर्दगिर्द एक कथा बुनीं गई है। इसकी कहानी में किसी भी प्रकार की जटिलता महसूस नहीं हुई । नाट्य निर्देशक ने केंद्रीय चरित्र के माध्यम से समाज का आईना दिखाया। नाटक में हिंसा के प्रतीक के लिए बुनें गए चरित्र के  प्रति सजगता की अपेक्षा है जिसमें अलग अलग जगह में अलग अलग शब्द का प्रयोग किया गया।

ओड़िया नाटक का दृश्य


ओड़िया भाषी न होने के बावजूद नाटक संप्रेषित हुआ, कलाकार का सधा और तयशुदा अभिनय पूरे नाटक में दिखा। सभी कलाकार लगातार नाटक करते हैं यह उनकी कल की प्रस्तुति देखकर महसूस हुआ। छोटी बच्ची के रूप में  रेवती का अभिनय सहज लगा। पार्श्व संगीत में बहुत गुंजाइश है। ओड़िया नाटक के नाटककार हैं बिधु भूषन पांडा और इसे निर्देशित किया बिक्रम केशरी जेना ने।

ओड़िया नाटक का दृश्य
ओड़िया नाटक का दृश्य
ओड़िया नाटक का दृश्य


नाटक देखने के बाद अक्सर ही यह बात दिलो-दिमाग पर पेंडुलम की तरह बजती रहती है और जिज्ञासा भी बनीं रहती है कि नाटक लिखते, पढ़ते और खेलते हुए अब तक कितने लोगों ने अपने आप को बदलने की बात रेखांकित की, कितने लोगों ने नज़रिया बदल जाने की बात स्वीकारी या कितने लोगों ने जीवन में गंभीर बदलाव किए। हो सकता है यह बात कहीं दर्ज़ हो जिसकी जानकारी मुझे नहीं पर यह लिखते हुए स्वयं को भी प्रश्नाकित कर रही हूं कि क्या मुझमें बदलाव आया?

बहरहाल यह हमेशा लगता है कि नाट्य मंच वो एरीना होता हैं जिसमें सवाल की मोटी रस्सियां मान्यताओं के स्थापित खंभों में बंधी होती हैं। जब-जब कोई अभिनेता इन सवालों से टकराता है मान्यताओं के खंभे उखाड़ना चाहता है तब-तब हमारे जीवन धरा की मिट्टी उलटती- पलटती है और जीवन-धरा को उर्वर बनाने की प्रक्रिया चलती है। रंगकर्म के प्रति इस बुनियादी विश्वास के बूते ही हम नाटक रचते, खेलते हैं ।
रंगकर्म के प्रति इस विश्वास को पुख़्ता करने जोधपुर इप्टा ( राजस्थान इप्टा)। की टीम ने कृश्न चंदर की कहानी ‘ थाली का बैगन ‘ की प्रस्तुति की। यह एक संयोग रहा कि इसी कहानी की नाट्य प्रस्तुति भिलाई इप्टा के रंग शिविर के दौरान बच्चों ने भी की। एक ही समय में दो स्थान की इप्टा द्वारा इस कहानी का चयन इसकी सार्थकता और ज़रूरत को रेखांकित करता है।
कृश्न चंदर की कहानी ‘ थाली का बैगन ‘ नाटक पर बात करने से पहले आपसे आग्रह है कि चालीस और पचास के दशक में लिखी कहानी अगर आपने नहीं पढ़ी है तो कृपया ज़रूर पढ़े, कहानी का लिंक है –

https://hindikahani.hindi-kavita.com/Thali-Ka-Baingan-Krishan-Chander.php

थाली का बैगन नाटक का दृश्य

जाति और धर्म के नाम पर उगाही करने वाली बरकरार प्रवृत्ति पर गहरी चोट है ‘ थाली का बैगन ‘


गरीबों के जीवन के अंधेरे की कथा है ‘थाली का बैगन ‘


जीने के लिए शॉर्टकट के उपाय पर व्यंग्य है ‘थाली का बैगन ‘


अज्ञानता की पराकाष्ठा पर व्यंग्य है ‘थाली का बैगन ‘

अवसरवादिता का उदाहरण है ‘थाली का बैगन ‘

थाली का बैगन नाटक का दृश्य
थाली का बैगन नाटक का दृश्य
थाली का बैगन नाटक का दृश्य

कृश्न चन्दर लिखित कहानी ‘थाली का बैगन’ कहानी को निर्देशित किया विकास कपूर ने। नाटक में अभिनय पक्ष अच्छा रहा। हास्य की, व्यंग्य की टाइमिंग अच्छी रही। मुख्य अभिनेत्री और बच्चे के किरदार में जयदीप ने अच्छा अभिनय किया , लगा वे मंच में अपने किरदार को खेल रहे हैं। अक्सर हंसते हुए जब कोई गंभीर बात की जाती है तो जीवन की कड़वी सच्चाइयों के प्रति स्वीकार्य भी सहज हो जाता है। उम्मीद है दर्शक अपने समय से इसे जोड़कर देखेंगे और महसूस करेंगे कि आज के समय में हम धर्म, जाति के आधार पर किस तरह बंट गए हैं और दुनिया को जीते जी नरक बनाने की भूमिका निभा रहे हैं। 

थाली का बैगन नाटक का दृश्य
थाली का बैगन नाटक का दृश्य

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