रिपोर्ट

हम गले मिलते हैं, शुक्रिया नहीं कहते : शबाना आज़मी

इप्टा बतौर इप्टा इंडिया के रूप में काम कर सकें – इस विजन को लेकर 1985 में इप्टा को पुनर्गठित करके काम करने वाले जितेंद्र रघुवंशी की याद में इप्टा के नेशनल थिएटर फेस्टिवल 2026 का आगाज़ हुआ। मुंबई के मैसूर एसोसिएशन में अभिनेत्री शबाना आज़मी के साथ इप्टा की राष्ट्रीय समिति, मुंबई इप्टा, नाशिक इप्टा की महिला साथियों द्वारा दीप प्रकाशित कर साझा उद्घाटन किया गया। इस आयोजन में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश, राष्ट्रीय महासचिव तनवीर अख़्तर, सचिव उषा आठले, शैलेन्द्र कुमार, मनीष श्रीवास्तव, संयुक्त सचिव वर्षा, अर्पिता, झारखंड इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष उपेन्द्र मिश्रा, अलवर से सर्वेश जैन विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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मसूद अख़्तर

स्वागत सम्बोधन में उत्सव की अनुभूति से भरी मुंबई इप्टा की अध्यक्ष सुलभा आर्य ने जन के लिए काम करने वाली इप्टा को अपना परिवार बताते हुए स्वागत सम्बोधन में कहा कि इस तरह के आयोजन से ऊष्मा और ऊर्जा मिलती है। उद्घाटन सत्र में मुंबई इप्टा के महासचिव मसूद अख़्तर ने जब कैफ़ी आज़मी और शौकत कैफ़ी को याद करते हुए शबाना आज़मी को इप्टा की बच्ची कहकर उन्हें मंच पर बुलाया और उनका शुक्रिया अदा किया तो भावुक होकर शबाना आज़मी ने अपने सम्बोधन की शुरुआत में कहा कि हम सभी कॉमरेड्स हैं और हम गले मिलकर मिलते हैं हम किसी का शुक्रिया अदा नहीं करते, इसलिए इप्टा का शुक्रिया नहीं कहूँगी पर यह ज़रूर कहना चाहूँगी कि मैं भावुक हुई हूँ और तसल्ली हुई है कि हम अपने बुजुर्गों की याद करते हैं। ख़ास तौर से इप्टा के जो बुजुर्ग हैं उनकी फेहरिस्त तो बहुत लंबी है; क्योंकि जब हम कल्चरल स्पेस में देखते हैं तो जितने भी दिग्गज कलाकार हुए हैं सबकी शुरुआत इप्टा से हुई है। यह हमारे लिए गर्व की बात है । मेरी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई, जहाँ मेरे माँ-बाप ने कहा कि कला को सामाजिक बदलाव का एक माध्यम बनाकर चलना चाहिए। आज के दौर में यह देखा जा रहा है कि मनोरंजन के नाम पर यह माध्यम अब धीमा-हल्का होता जा रहा है। हमें मायूस होकर बैठने के बजाय अपनी नौजवान पीढ़ी को सशक्त बनाने की ज़रूरत है कि वे इस मिशन को आगे ले जाएँ। इप्टा को आगे बढ़ाने के लिए आपसी संवाद करने की बात करते हुए युवाओं को हम फिर से बताए कि इप्टा कैसे बना और क्यों बना। इप्टा का मिशन और मक़सद क्या है? नई पीढ़ी के लिए इप्टा की सोच को जज़्ब करने के लिए संवाद ज़रूरी है। आज के समय में सांस्कृतिक स्पेस सिकुड़ रहे हैं, पर हम उस संगठन के लोग हैं जिन्होंने विपरीत समय में भी हार नहीं मानी है। हम अपनी प्रतिबद्धता से हमेशा आगे बढ़े हैं। नौजवान पीढ़ी की उपस्थिति से खुशी हुई कि हम इनके साथ अपने कल्चरल स्पेस को बचा पाएँगे। ये ज़रूरी नहीं कि किसी मकसद के लिए किए जाने वाले काम में मनोरंजन ना हो, मनोरंजन होना चाहिए। आज के समय में आसपास के कई जोक्स को जोड़कर थियेटर बनाया जा रहा है मगर यह थियेटर नहीं है। थियेटर का मक़सद और उसकी तकनीक को हमें बढ़ावा देना ज़रूरी है। हमें ऊपर से देखकर लगता है कि थियेटर फिल्म जैसा ही है, पर फिल्म एकदम रियलिस्टिक होती है। अगर आपको पेड़ दिखाना है तो पेड़ दिखा सकते हैं पर थियेटर में किसी मुद्रा में खड़े होकर अभिनेता आपको यकीन दिला सकता है कि वो पेड़ है। Willing suspection of disbelief ही थियेटर की खूबी है और यही थियेटर है जो आपको विश्वास दिलाता है कि आप पेड़ हैं। थियेटर के कोर पर हमें ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है। थियेटर के माध्यम से हम संदेश दें पर इसे हमें इसकी पूर्णता में एक्सप्लोर करने की आवश्यकता है और तभी हमने जो नींव रखी थी उसके साथ इंसाफ कर पाएंगे। इस बात के साथ बड़ी उम्मीद के साथ फेस्टिवल में आप सभी का स्वागत है।

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उषा आठले
अर्पिता
रंजना

उद्घाटन सत्र के बाद इप्टा मुंबई की सांगीतिक प्रस्तुति हुई – ‘वाको नाम कबीर ‘ शीर्षक से। संगीतकार कुलदीप सिंह और उनकी टीम द्वारा कबीर को शिद्दत से याद किया गया। इस सांगीतिक प्रस्तुति में संचालक अतुल तिवारी ने हर गीत के बाद अपने शानदार संवादों के माध्यम से एक घंटे की प्रस्तुति में कबीर की बातों को गहराई प्रदान की और कबीर को देखने-समझने का उम्दा नज़रिया दिया। हम उम्मीद करते हैं कि इस तरह की प्रस्तुतियों से युवा वर्ग का कबीर को जानने का रुझान और जिज्ञासा बढ़ेगी।

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अतुल तिवारी

कबीर ऐसा भक्त था जो अपने भगवानों के मंदिर ख़ुद ढहाता-फिरता था, वैसा गृहस्थ था जिसका घर था पूरा ब्रह्मांड और आँगन था अंतरिक्ष। वो ऐसा बागी था जो धर्म के मूल से ढोंग की जड़ों को निर्मूल करता रहता था। वो ऐसा विद्वान था जो वेद, पुराण, कुरान का सार सिर्फ़ ‘ढाई आखर प्रेम’ बताता था। वो ऐसा दीवाना था जो भटक-भटककर लोगों को सही राह दिखा देता था; वो ऐसा जुलाहा था जो सबद, साखी, रमैनी के ताने-बाने से जादू बिखेरता था। वो ऐसा शायर था जो अपने छंदों से एक नए संसार का नक्शा उकेरने की कोशिश कर रहा था। वो ऐसा दूर का सितारा था जो सबके पास था और सबसे पास आज भी है। वो ऐसा आला, उत्तम, अज़ीम कबीर था कि दुनिया कहती थी

हद्द तपें सौं औलिया बेहद तपें सो पीर
हद्द बेहद दोऊ तपें वायकों नाम कबीर

उसी कबीर के वंशज जो इप्टा वाले आज बैठे हैं उस कबीर को याद करने कि कोई एक चीज़ जो कबीर को अपने युग से अलग करती थी वो था उनका फक्कड़पन, उनकी सरलता और उनका मस्ताना इश्क़िया अंदाज़। एक घंटे में मुंबई इप्टा के संगीतकार कुलदीप सिंह और साथियों की टीम ने कबीर की निम्नलिखित रचनाएँ प्रस्तुत कीं –

हमन है इश्क़ है मस्ताना, हमन को होशियारी क्या

जग बौराना बौराना बौराना देखो जग बौराना साधु देखो जग बौराना

दुल्हिन अंगिया काहेन न धोवाई

अनहद का बाजा बाजता

मन बनिया वंज न छोड़े जनम जनम का मारा बनिया

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कबीर के झकझोरने वाले शब्दों का खारापन, संगीतकार कुलदीप सिंह की सुमधुर धुनों और जन-जागृति के तालों से सराबोर गीतों और सभी गायकों की तन्मय आवाज़ों के साथ कबीर का समूचा दर्शन सटीक और आकर्षक तरीक़े से अतुल तिवारी ने दर्शकों के सामने रखा जिसने सब को कबीरमय कर दिया।

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उद्घाटन के पूर्व इप्टा के राष्ट्रीय संरक्षक 95 वर्षीय एम एस सत्थ्यु जी का वीडियो संदेश प्रसारित किया गया।

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