श्रम की गरिमा – १
मेहनत से ये माना चूर हैं हम
आराम से कोसों दूर हैं हम
पर लड़ने पर मजबूर हैं हम
मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम
(पूरी नज़्म आप कविताकोश या रेख़्ता में पढ़ सकते हैं )
‘मज़दूरों का गीत ‘ जिसे मजाज़ ने लिखा है यह पूरा गीत मज़दूरों की असल हालत बयान करने वाला है। मज़दूरों ने दुनिया के तमाम मज़दूरों के लिए जो ऐतिहासिक संघर्ष किया, शिकागो में लड़ाई लड़ी वो हम सबके लिए नज़ीर है। उनके ऐतिहासिक संघर्ष और वर्तमान परिस्थिति में मज़दूरों की हालत किसी से छुपी नहीं है। सरमायेदारी पूंजीवादी युग में इसमें इज़ाफ़ा ही हुआ है। इस पीड़ा और संघर्ष को महसूस करने के लिए वर्गीय संघर्ष की चेतना ज़रूरी है पर कई बार हमारा ज्ञान किताबों से निकल कर जीवन के अभ्यास में नहीं पहुँच पाता जिसके लिए ज़रूरी है कि इस अभ्यास के लिए हम अपनी ज़मीन तलाशें। हम वहाँ जाएं जहां अपनी चेतना को औजार के रूप में धारदार कर सकें,संवेदनशील बना सकें और वर्ग संघर्ष की ज़मीन में ठोस काम कर सकें। ये सारी बातें सबसे पहले स्वयं के लिए लिखी है और उसके बाद पाठकों के लिए कि याद रहे कि काम और ईमान से न डिगें।
‘मज़दूर ‘ इनके बारे में बच्चे क्या सोचते हैं ये बातें तो यहां दर्ज़ होंगी पर उससे पहले यह बताना आवश्यक है कि बच्चों के साथ काम करते हुए ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है कि रचनात्मकता के किन स्रोतों का इस्तेमाल किया जाए कि वे स्वयं को जोड़कर देख पाएं और समझ पाएं। पिछले कुछ दिनों से लगातार इसी उधेड़बुन में गुज़रा कि कैसे ‘श्रम की गरिमा ‘ पर बात की जाए, क्या कोई विषय देकर कोई इम्प्रोवाइजेशन कराके संवाद किया जाए या फिर कोई गतिविधि , कोई कहानी,कविता या कोई फिल्म। दुविधा उस जगह बढ़ जाती है जहां कक्षा दूसरी से किशोरावस्था तक के बच्चे हों। किसी की समझदारी ऐसी कि आपने कोई बात की बॉल उछाली और उधर कैच यानी काम आसान पर कुछ बच्चे बहुत से शब्दों के अर्थ से अभी दूर हैं तो आसान भाषा के साथ उसे समझाने का मोड हमेशा ऑन रखना पड़ता है बहरहाल बात करते हैं उस प्रक्रिया कि जिसे दर्ज़ करने इतनी लम्बी भूमिका बनाई।
गीत , कविता और कहानी ढूंढने के क्रम में कुछ अच्छी नज़्म और कविताओं से परिचय हुआ और इसी क्रम में लगा कि श्रम से जुड़े वे तमाम श्रम के काम से जिन्हें जातिवादी समाज हेय दृष्टि से देखता है उनसे जुडी जानकारियां जुटाई जाए और फिर बच्चों से बात की जाए। आज मौलिक अधिकारों से बातचीत शुरू की और उन्हें समानता का,स्वतन्त्रता का ,शोषण के विरुद्ध,धर्म की स्वतंत्रा का,सांस्कृतिक और शिक्षा का, संवैधानिक उपचारों का अधिकार को बच्चों के जीवन से जोड़कर बात की।
जब बच्चों से पूछा कि १ मई को क्या मनाया जाता है तो आसानी से जवाब आया
जवाब – ‘मज़दूर दिवस ‘
मज़दूर क्या करते हैं ?
जवाब – मेहनत
किन्हें मज़दूर कहा जाता है ?
जवाब – घर बनाने वाला,फैक्ट्री में काम करने वाला, माली, रोड बनाने वाला, स्कूल बनाने वाला…इस बारे में उनसे अभी और बात की जानी शेष है बहरहाल अब आती हूँ उस गतिविधि पर जो उनकी समझ को पुख़्ता बनाने में मददगार होगी और उम्मीद करती हूँ कि वे इसे हमेशा याद रख पाएंगे।
बच्चों को बताया कि श्रम करने वालों में दुनिया के सबसे पहले श्रमिक आदिवासी हैं।
आदिवासी कैसे पहले श्रमिक हैं इस पर बात करने से पहले उनसे जाना कि वे कितना जान पाए हैं और समझ पा रहे हैं। यहां लिटिल इप्टा के बच्चों का हमारे आदिवासी साथियों से बातचीत , समय गुज़ारना और ‘ढाई आखर प्रेम ‘ यात्रा के अनुभव,कुछ कहानियां जो कहीं अंकित हुई और शहरी माहौल में आसपास सुनकर बनीं समझ महसूस कर पाएंगे। सभी साथियों को कहा कि आप ‘आदिवासी ‘ से क्या समझते हैं ? इस पर अपनी समझ लिखिए। बच्चों के जवाब साझा कर रही हूँ –
साहिल ( पहली कक्षा ) –
- आदिवासी पानी पीते हैं .
- आदिवासी शिकार करते हैं।
- आदिवासियों के पास तीर – धनुष होता है।
काव्या (कक्षा दूसरी ) –
- आदिवासी जंगल में रहते हैं।
- आदिवासी खाने में मांस खाते हैं।
- आदिवासी शिकार करते हैं।
- आदिवासी चूल्हा में खाना बनाते हैं।
- आदिवासी काम करते हैं।
- आदिवासी नदी में नहाते हैं।
गुंजन ( कक्षा – चौथी ) –
- आदिवासी जंगल में रहते हैं।
- वह जंगल के फल खाते हैं।
- वह हम सब से अलग रहते हैं।
- वह जानवर के शिकार भी करते हैं।
अभिषेक ( कक्षा – चौथी ) –
- आदिवासी हम लोगों से थोड़ा अलग रहते हैं।
- आदिवासी अपने त्यौहार में ढोल -नगाड़े बजाकर मनाते हैं।
- आदिवासी के घर में चोरी नहीं होती।
- आदिवासी लोग रात में चाँद देखकर नाचते हैं।
- आदिवासी शिकार करते हैं।
- आदिवासी लोग अपने घरों को अच्छे से सजाते हैं।
श्रवण ( कक्षा -छह )
- आदिवासी सूखी लकड़ियां लेते हैं।
- आदिवासी अपने बच्चों के लिए काम करके उन्हें खिलाते – पिलाते हैं और स्कूल भेजते हैं।
- आदिवासी बहुत मेहनत करके भी खाना नहीं पाते हैं।
- आदिवासी पेड़ को बचाते हैं और पेड़ को काटते नहीं हैं।
- आदिवासी कोई भी परब में आसापास के पेड़ को पेण्ट करते हैं।
- आदिवासी प्रेम से रहते हैं।
- आदिवासी डांस करके परब मनाते हैं।
नम्रता ( कक्षा -आठ ) –
- आदिवासी कई तरह के होते हैं।
- आदिवासी लोग अपने घरों को रंगों से सजाते हैं।
- वह लोग अपनी ज़रुरत से ज़्यादा सामान नहीं लेते हैं।
- वह लोग अपने घर के आँगन में गोबर लगाते। हैं
- वे लोग जंगल , पेड़-पौधों से बहुत प्रेम करते हैं।
सुरभि ( कक्षा – नौ )
- आदिवासी बहुत मेहनती होते हैं।
- वो लोग प्रकृति को बहुत मानते हैं।
- वे लोग प्रकृति से जुड़े सामान इस्तेमाल करते हैं।
- वे लोग बहुत सरल ज़िंदगी जीते हैं।
- वे लोग प्रकृति को बचाकर रखते हैं।
- वे लोग सबसे मिलजुलकर रहते हैं।
- वे लोग अपना कोई भी परब बहुत अच्छे से मनाते हैं और सब मिलकर मनाते हैं।
- वे लोग प्रकृति को अपना सब मानते हैं।
ध्रुव ( कक्षा -नौ )
- These people live in wild area .
- They are not very educated.
- I’ve seen them generally collect wood that are fallen from trees .
- They do not have much money.
- They live a very simple life .
- Generally they are not very much into technology .
अमन ( कक्षा -नौ इसने अभी आना शुरू किया है )
- आदिवासियों का मुख्या भोजन पाखाल – भात है।
- इनका कमाने का एक ही – जरिया है खेती-बाड़ी।
- ये अपना अनाज शहरों में बेचकर काम चलाते हैं .
- इनके पास खाना बनाने के लिए कोई सुविधा नहीं होती इसलिए ये अपना खाना चूल्हा में बनाते हैं।
- इनका मुख्य पर्व -सरहुल,करमा,टुसू।
सुमित ( कक्षा -दस , इस साथी का आज दूसरा दिन रहा ) –
- आदिवासी एक धर्म है।
- आदिवासियों को हथियार बनाने का शौक था जैसे तीर – धनुष , तलवार आदि .
- उन्हें शिकार का भी शौक था।
सुजल (कक्षा – ग्यारह ) –
- आदिवासी जंगल के रखवाली माने जाते हैं।
- आदिवासियों से ज़्यादा कोई जंगल को नहीं जानता है।
- उनका हर पर्व प्रकृति को ही समर्पित होता है।
- वे हरेक वास्तु का ज़रुरत के अनुसार ही उपयोग करते हैं।
- उन्हें किसी भी चीज़ जैसे -स्कूली शिक्षा , कपड़ा , खाने – पीने की चीज़ों के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है।
- हमारी प्रकृति को वे हमसे ज़्यादा जानते हैं।
- हमारी प्रकृति को यही आदिवासी लोग ही बचाते हैं।
दिव्या ( बी कॉम पहला सेम. )-
- आदिवासी लोग पेड़ , जंगल और पहाड़ को भगवान मानते हैं।
- वे लोग हमेशा एक फैमिली जैसे मिलकर रहते हैं।
- बहुत मेहनती होते हैं।
- वे लोग अपनी संस्कृति को बहुत सम्मान देते हैं।
- वे अपने मेहमान का बहुत सुन्दर तरीके से स्वागत करते हैं।

इस गतिविधि के बाद बच्चों के साथ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य साझा किये कि वे उससे वे आदिवासियों को जोड़कर देख पाएं जिसे साझा कर रही हूँ –
आदिवासियों की संस्कृति से परिचित होना अलग बात है और उनके करीब जाकर उनके साथ काम करना अलग। यह एक बहुत ज़रूरी पहल होगी कि शहरी बच्चे जिनकी समझ में आदिवासी की छवि स्कूली किताब तक ही सीमित है उसे विस्तार देने की रचनात्मक-सांस्कृतिक पहल की कोशिशें की जानी चाहिए।
आदिवासी हमारे पहले शिक्षक जिन्होंने उन कंदमूलों , फलों और मांसों की पहचान की जिन्हें हम आज खाते हैं आदिवासी इस भूमि पर निवास करने वाले सबसे पहले लोग हैं।
हमारे द्वारा उपभोग किये अधिकाँश कदया पदार्थों को आदिवासियों ने खोजा , चुना और उनके मानक स्थापित किये।
विभिन्न प्रकार के केले , अन्नानास , कटहल , आम , खरबूजे , सीताफल जैसे कई फलों की खोज की।
नीबू का खट्टापन खोजा ।
औषधीय गुणों से युक्त जंगली शहद खोजा ,ये सभी उदाहरण बस थोड़े से हैं पर आदिवाइयों ने इससे कई गुना ज़्यादा चीज़ों को खोजा है।
हज़ारों साल की आज़माइश द्वारा आदिवासियों ने उपयोगी खाद्य पदार्थों को अलग किया।
खाद्य संस्कृति में स्वाद का आयाम जोड़ने का श्रेय आदिवासी हैं।
आदिवासियों के पूर्वजों ने तय किया कि मनुष्यों को खाने के लिए किस जानवर का मांस उपयुक्त था और किसका नहीं
आदिवासियों ने हमारी मांस सम्बन्धी भोजन संस्कृति को विक्सित किया।
व्यापारिक तौर पर निर्मित की जा रही गोंद, लीसा ( चीड़ से निकलने वाला प्राकृतिक रेजिन ) और रंगों को भी सर्वप्रथम आदिवासियों ने ही खोजा।
भारत में आदिवासियों के ६२४ समुदाय हैं। वे भारत की आबादी का ८ % हिस्सा हैं।
कुछ आदिवासी समुदाय जैसे -भील,कोया,गोंड,सताल,उरांव,मुण्डा,हो,कोरकू,टोडा, जरावा और इरुलार हैं।
आदिवासी नायक हैं बिरसा मुण्डा,सिद्धो कान्हू, चाँद – भैरव। तिलका मांझी, तेलंगा खड़िया, टंट्या भील आदि। इनकी नामों की फेहरिस्त लम्बी है।
बच्चों से पूछा कि आप अंदाज़ लगाइये कि आदिवासी कितने पौधों की प्रजातियों को जानते होंगे तो उनका जवाब आया -४० , ३०, ५०,१००, ५०० , १००० , ३००० पर जब उन्हें बताया कि आदिवासी पौधों की करीब १०,००० प्रजातियों का उपयोग करते हैं तो वे अचंभित हुए।
बातचीत के बाद बच्चों की राय से एक और गतिविधि की जानी चाहिए तो इम्प्रोवाइजेशन का काम जो श्रम से जुड़ा हो वो बच्चों ने किया। दो समूह में बाँट दिया और उन्हें कहा कि कहाँ , कौन और कैसे ( Where,who, What) पर बिना संवाद के कुछ प्रस्तुत करने के लिए कहा। पहले तो उन्हें इन तीन शब्दों को समझाया और फिर दो समूह में बंटकर वे दो स्पेस , लोग और उसमें किये जाने वाले काम को दिखाकर दिलखुश किये। एक समूह जिसमें सुजल,श्रवण,नम्रता, ध्रुव और अमन थे उन्होंने पहला अखड़ा और दूसरा बिल्डिंग निर्माण का दृश्य बनाया। दूसरे समूह जिसमें दिव्या,सुरभि,काव्या,साहिल, सुमित और अभिषेक शामिल थे उन्होंने पहला खेत जिसमें कोड़ाई,बीज बुवाई, कटाई, और मेहनत किये जाने वाले स्त्री – पुरुषों को दिखाया और दूसरा ठेकेदारी प्रथा का दृश्य दिखाया।

खेत वाले इम्प्रोवाइजेशन को देखते हुए याद आया सराईकेला छऊ में पारंगत युधिष्ठिर महतो जिसने बहुत ही सुन्दर तरीके से श्रम की गरिमा को छऊ प्रस्तुति में दिखाया बतौर दर्शक वो अनुभव शानदार था। जो अनभिज्ञ है उनके लिए यह बताना ज़रूरी है कि छऊ पारम्परिक तरीके से ही रामायण – महाभारत की कहानियों को ही प्रदर्शित करता है पर युधिष्ठिर ने इसे श्रम के समान वेतन की अपील से जोड़कर देखा और प्रस्तुति तैयार की।


छऊ की प्रस्तुति के साथ ही पूर्व दिन की शाम का ज़िक्र ज़रूरी है जब पार्थो ने बच्चों के साथ संक्षिप्त समय काम किया जिसमें हवाई जहाज़ और टैंक बनाकर देखा जिसकी छवियाँ साझा कर रही हूँ।






