श्रम की गरिमा -२

‘जाति व्यवस्था श्रम का बंटवारा ही नहीं है बल्कि श्रमिकों का भी बंटवारा है ‘ – भीमराव अंबेडकर
इस वाक्य में दिखता है हमारे समाज का यथार्थ। आज़ादी के ७९ बरस बाद भी हम जूझ रहे हैं और जाति के दुष्चक्र से बाहर नहीं हुए बल्कि इसका घिनौना रूप सामने है।
जाति आधारित श्रम की बेड़ियों से कहाँ मुक्त हुए ?
जाति आधारित विवाह व्यवस्था से कहाँ मुक्त हुए ?
जाति आधारित भेदभाव से कहाँ मुक्त हुए ?
जाति आधारित जीवन के नज़रिए से कहाँ मुक्त हुए ?
पूरे देश में जाति के साथ धर्म का आवरण करेला नीम चढ़ा कहावत सही बैठती है। इस बारे में जितना लिखा जाए कम है क्योंकि इस दिशा में काम तभी होगा जब लोग पूर्वाग्रहों से मुक्त होंगे। हमारे स्कूलों में भेदभाव और समुदायों के बीच बढ़ती दूरी चिंताजनक है। बच्चों के अनुभव सुनकर दिल दहल जाता है कि स्कूलों में हिन्दू-मुसलमान होता है,जो बच्चे मुस्लिम समुदाय से आते हैं उनके प्रति बच्चों में नकारात्मक व्यवहार जो निश्चित रूप से आने वाले समय में घृणा में बदलेगा। जब स्कूलों में बहुसंख्यक समुदाय के विभिन्न वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं वहाँ सामान्य स्कूलों में अल्पसंख्यक समुदाय की अनुपस्थिति या कम संख्या हमारे समाज की तस्वीर दिखाने के लिए पर्याप्त है। गरिमाहीन शब्दों का इस्तेमाल बच्चों के बीच आम है और उसे दूर करने की कोई कोशिश स्कूलों में होती तो ऐसी बातें सुनने नहीं मिलती। उदास करने वाली ढेर सी सूरतें बन चुकी हैं. यूं ही नहीं कहा गया है कि
जाति है कि जाती नहीं।
श्रमिकों के जीवन में जाति ने जो जंजाल बुना उसके मकड़जाल से श्रमिक अभी तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। पिछली पोस्ट में हमने आदिवासी के बारे में बात की थी जिसे आप इस लिंक में पढ़ सकते हैं। (https://padhateseekhate.com/shram-ki-garima-1/)
बच्चों के साथ अगली बारी आई पशुपालक और चर्मकार के बारे में बात करने की। बच्चों से बात करने के लिए और यह कोशिश किये जाने के लिए कि हम साथ में पढ़कर अपनी समझ पुख़्ता बना पाएं। निश्चित ही बच्चों के साथ हर वर्ष इस तरह का अभ्यास करना होगा जिससे वे इन्हें अपनी याद में और समझ में दर्ज़ कर पाएंगे। बहरहाल यह भी उल्लेखित करना ज़रूरी है कि कांचा आईलैया ने मुझे रास्ता दिखाया और इतनी ज़रूरी बात उनसे कर पा रही हूँ। बच्चों के साथ काम करते हुए यह बहुत अच्छे से समझ आया कि साहित्य के माध्यम से हम कितनी आसानी से अपना रास्ता तय कर पाते हैं। उन्हें पढ़ते हुए ही गतिविधि सूझी और उन्हें पढ़ते हुए ही कुछ सवाल जन्में जो बच्चों से करने पर कुछ नया जानने मिला।
बच्चों को बताया कि खेती से पहले मानव सभ्यता पशुपालक यानि पशु पालने वाली। जो भी आप पशुपालक के बारे में जानते हो बताओ तो उन सब में एक – एक जवाब से मोटामोटी सभी बातें आई यथा –
- गाय,बैल,बकरी,भैंस,भेड़ को पाला करते हैं।
- उनसे हमें दूध,मांस, ऊन और चमड़ा मिलता है।
- पशुओं को खाना देते होंगे तो इसमें अगले ने जोड़ा चारा के लिए ले जाते होंगे।
- नहलाने के लिए नदी ले जाते होंगे।
- उनके रहने के लिए घर बनाते हैं।
- पशुपालक अपने पशुओं का बहुत ध्यान रखते हैं, प्यार करते हैं।
- हमें गोबर मिलता है जिससे लीपते हैं और गोईठा (कण्डा ) बनाते हैं।
‘पशुपालक ‘ से जुडी ज़रूरी बातों की जानकारी बच्चे जानते हैं। अब उनसे पूछा कि चर्मकार के बारे में क्या जानते हैं तो झट से क
-चमड़े से तबला बनाता है।
– चप्पल ,बैग,जूता और बाजा बनता है।
-चर्मकार लोग जब जानवर मर जाते हैं तो उन्हें उठाकर ले जाते हैं।
इन बुनियादी बातों के बाद पूछा –
सवाल – दूध किसका ज़्यादा पौष्टिक होता है गाय का या भैंस का ?
जवाब – (एक स्वर में जवाब आया) गाय का।
सवाल – क्यों ?
जवाब – एक ने कहा कि भैंस के दूध को तो कई लोग पीते भी नहीं है , पसंद नहीं करते ?
सवाल – क्यों ?
जवाब – घिनाते हैं दीदी।
यह मेरे चौंकने की बारी थी तो उसने बताया कि गाँव में किसी के घर में २० भैंसें थी पर बहुत से लोग घिन करते थे ,भैंस का दूध नहीं पीते थे। भैंस का दूध अलग भी दिखता है तो उन्हें बताया कि उसके और गाय के दूध में रंग का ही अंतर होता है। बच्चों से बात करने पर बहुत नई बातें पता चलाती है। अब उन्हें वे तथ्य साझा किये जिसे सुनकर वे चौंके कि भैंस का दूध ज़्यादा पौष्टिक और फायदेमंद होता है। इसके बाद यूं ही पूछा कि यह बताओ कि दूध तो गाय और भैंस दोनों ही देती हैं पर गौ माता की पूजा होती है पर भैंस का तो कोई नामलेवा नहीं।
थोड़ा सोचकर बोले – भैंस काली होती है न। उनकी जानकारी बढ़ाने के लिए याद दिलाया यमराज का वाहन भी भैंस है।
पशुपालकों में ईसा मसीह, मोहम्मद पैगम्बर और कृष्ण शामिल हैं। कई समुदायों में पशुपालक भगवान है क्योंकि वे पूरे समुदाय की देखरेख करते हैं फिर भी हमारे समाज में पशु पालने वाले लोगों को हिकारत की नज़र से देखा जाता है। सभी दूध,दही,मक्खन,पनीर,घी का इस्तेमाल करेंगे पर इन्हें बनाने वाली परिष्कृत करने वाली पशुपालक स्त्रियों के योगदान को विस्मृत किये हैं। हमारे तमाम धर्म ग्रंथों में इस योगदान को रेखांकित नहीं किया गया है जबकि अलौलिकता को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा गया है और उन ग़ैर वैज्ञानिक बातों पर धर्मभीरू लोग विश्वास भी करते हैं।
पशुपालक समुदाय की तरह ही चर्मकार/चमार समुदाय को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। हमारे समाज में चमार समुदाय को जाति क्रम में निम्नतम क्रम में रखा गया है। गाँव में इन्हें दक्षिण टोला में रखने के पीछे की कलुषित मानसिकता से हम परिचित हैं। जब कहीं जानवर मरता है तो सामाजिक कर्त्तव्य की दुहाई देकर काम कराया जाता है। जिन्हें हमें साफ़ – सफाई सिखाने वाले शिक्षक के तौर पर प्रतिष्ठित करना चाहिए उन्हें हमने गंदा काम करने वाला का सम्बोधन दिया,उनके काम को,समुदाय को (चमार ) गाली के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे जीने के लिए साफ़ वातावरण बनाने वाले चर्मकारों के जीवन को जातिप्रथा ने गर्त में पहुंचाया।
बच्चों से पूछा कि ये सब हम लोग पढ़ रहे हैं तो इसे जानकर क्या प्रतिक्रिया है –
एक – जैसे कि काले – गोरे में भेदभाव होता है। यह ग़लत है कि अगर सभी लोग कह रहे हैं पर हमें उन्हें ‘चमार ‘ नहीं कहना चाहिए। इंसान तो इंसान है तो उन्हें ऐसे क्यों पुकारना चाहिए।
दो – बाकी लोग समझते हैं कि हम उच्च हैं। उन्हें अछूत मानते हैं। वे देखा जाए तो हमारे देश की सफ़ाई करते हैं और हम उन्हें अछूत कहते हैं।
तीन – जो लोग साफ़ – सफाई का काम कर रहे हैं वे हम सबके लिए कर रहे हैं तो हमें ऐसा नहीं कहना चाहिए।
सवाल – क्या ये काम करते रहना चाहिए ?
जवाब – सभी को करना चाहिए दीदी ।
सवाल – ये कैसे होगा ?
जवाब (एक) – सबको अपने हिस्से की सफाई करनी चाहिए।
दो – जाति का भेदभाव खत्म करना चाहिए।
तीन – जो लोग नीची नज़र से देखते हैं वो बदलना चाहिए।
चार – ये नहीं सोचना चाहिए कि ये उनका काम है।
पांच – सामज में जागरूकता लानी चाहिए। जैसी समझ अभी विकसित हुई है उसे खेमा करना चाहिए। सफाई के कार्य के महत्व को रेखांक्ति करते हुए लोगों को बताना चाहिए।
छठा – अच्छा – बुरा प्रभाव बताना चाहिए।
सातवां – पढ़ने से बदलेगा।
इन तमाम बातों में और भी बहुत सी बातें जुड़नी ज़रूरी हैं जिससे सोच को एक सही दिशा में जाने का रास्ता मिलेगा। पढ़ने और जानने की इस कोशिश को ज़मीनी स्तर पर करने के लिए आज १ मई को हम एक युवा किसान नवीन के खेत में शहर से लगभग १६ किलोमीटर दूर रूगड़ीडीह गाँव गए। बच्चों के साथ १ मई को श्रम करके करने को लेकर बच्चे उत्साहित थे। पिछले दो दिन की बारिश की वजह से सुबह में ठंडक थी। शहर से बाहर पहुँचते ही हल्की धुंध दिखी जो प्रदूषित शहर में सम्भव नहीं ।
बच्चों ने युवा किसान नवीन के मार्ग-निर्देशन में कमली साग के खेत के एक बहुत छोटे हिस्से से घास निकालने का काम किया जो पूरी तरह से पाने से भरा हुआ था। हम सबके अनुभव का इज़ाफ़ा हुआ जब नवीन ने अपने किसानी जीवन के अनुभव हमसे साझा किये। उन्होंने अपने बारे में बताया –
नवीन के पिता किसानी करके उन्हें और उनके तीन भाइयों को पढ़ाये-लिखाए। कक्षा छह से नवीन सप्ताह में दो बार सायकिल में सब्ज़ियां लेकर खडंगाझार बाज़ार जाते थे। उनका स्कूल घर से छह किलोमीटर था जहाँ पैदल चलकर एक घंटे में पहुँचते थे। बहुत मेहनत से पढ़कर नवीन अभी किसान के साथ सामाजिक कार्य में लगे हुए हैं। वे पीपुल फॉर चेंज नाम के एक एन जी ओ से जुड़े हैं। रूगड़ीडीह और उसके आसपास के क्षेत्र भिन्डी उत्पादन में बहुत आगे है। इसके अलावा गायों के लिए और आमदनी के लिए वे कलमी साग लगाए हैं। आसपास के खेतों में बहुतायत में भिन्डी लगी है और ज़्यादातर खेतों में काम करने वाली स्त्री श्रमिक दिखाई दी इनके अलावा घर के बच्चे भी श्रम करते दिखे। जिनमें से कुछ से बात करने पर पता चला कि सुबह छह से दोपहर १२ बजे तक के श्रम का उन्हें १५० / – मिलता है। उनमें से कुछ श्रमिक साथियों का नाम याद है जो हैं – बसन्ती,उर्मिला,गुड्डी।
नवीन ने खेत में पहुँचते ही लिटिल इप्टा के साथियों को बताया कि जब कोई आपसे यह कि हमें खाना कैसे मिलता है तो आप कहेंगे मां देती है पर आपकी थाली तक पहुँचने में ढेर सारे लोगो का योगदान होता किसान, श्रमिक,मंडी तक ले जाने वाले ड्राइवर, खरीददार माता-पिता और फिर खाना बनाकर देती मां। इस पूरी यात्रा में हर फसल अलग-अलग समय लेती है तो इतनी मेहनत के बाद पहुंचे खाने को आप थाली में छोड़ते हो या पूरा खाते हो ? तो २ – ३ बच्चों ने बताया कि वे छोड़ते हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भिन्डी के तैयार होने की ३ महीने की अवधी बताई जिसमें लगातार देखभाल की ज़रुरत होती है। जब फल लग जाते हैं तो रोज़ तोड़ना पड़ता है जिससे फसल अच्छी हो। इसके बाद सभी बच्चों को बतया कि कैसे हमें कमली साग और खीरा के पौधों के बीच से घास-पांत निकलना है। लिटिल इप्टा के दो बच्चों को छोड़कर सभी बच्चों का खेत में काम करने का पहला अनुभव रहा।
निश्चित ही हमारी ये कोशिशें कहीं बड़ा दख़ल नहीं दे रही हैं पर सामाजिक और सांस्कृतिक ज़मीन बनाने की कोशिश कर रही हैं। जिस तरह के समय में हम जी रहे हैं उसमें बाज़ार और पूंजी ने मनुष्य को असंवेदनशील बनाने में कहीं कोर – कसर नहीं छोड़ी है और ऐसे निराशा भरे समय में चुप बैठ जाने की कायरता भी नहीं कर सकते वैसे भी परिवर्तन की कोशिश के बीच से ही लाल उजाला फैलेगा और अपने आग़ोश में दुनिया को ले लेगा।
पुर-उम्मीदी के साथ यह जोड़ना चाहूंगी कि बच्चे जिस जगह में होते हैं वे उनके मिजाज़ में ढल जाते हैं और हर जगह उनकी हंसी और खुशी से हम ख़ूबसूरत बन जाते हैं तो आज की सुबह ऐसी ही रही। मई दिवस में मज़दूरों को याद करते लगभग दो – ढाई घंटे खेत में गुज़ारना किसान के श्रम और संघर्ष के गाढ़े हरे एहसास से भरा। हम लोगों के साथ साथी रामचंद्र मार्डी भी रहे। नवीन के साथ बहुत पहले भी एक बार साझा श्रम की बात हुई थी और आज फिर से उस पर बात हुई कि हम लोग कोशिश करें कि आसपास कहीं एक किचन गार्डन या फूलों को लगाकर निरन्तर श्रम से स्वयं और लिटिल इप्टा के साथियों को जोड़ने की कोशिश करें।





