याद ए पुरखे

एक शाम कैफ़ी आज़मी के नाम

‘जमशेदपुर इप्टा का तरही मुशायरा’

साथी संजय सोलोमन

10 मई का दिन होता है कैफ़ी आजमी को याद करने का। इन्क़लाब और आज़ादी के हक़ में लिखने वाले हरदिल अज़ीज़ शायर का। इस नज़रिए के एवज़ में उन्हें कई पाबंदिया और तकलीफ़ें भी झेलनी पड़ीं लेकिन उन्होंने अपने बग़ावती तेवर नहीं बदले। कैफ़ी आज़मीं फ़िरकापरस्ती और मज़हबी कट्टरता के हमेशा मुख़ालिफ़ रहे। मुल्क़ में समाजवाद आए कैफ़ी आज़मी का यह सपना था। वे लोगों से अकसर यह कहा करते थे‘ मैं ग़ुलाम हिंदुस्तान में पैदा हुआ,आज़ाद भारत में जिया और समाजवादी भारत में मरूँगा। लेकिन अफ़सोस ! कैफ़ी आज़मी की आख़िरी ख़्वाहिश उनके जीते-जी नहीं पूरी हो सकी । उनका सपना अधूरा ही रहा। 10 मई। 2002 को यह इंक़लाबी शायर यह कहकर हमसे हमेशा के लिए जुड़ा हो गया –

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने ।

मज़दूर,किसान और स्त्रियों की आवाज़ बुलंद करने वाले शायर कैफ़ी आज़मी को याद करने के लिए जमशेदपुर इप्टा ने ‘तरही मुशायरा’ इस अहद,इरादे से किया कि दुनिया के लिए हम भी कोई मक़सद तय कर पाएं क्योंकि कैफ़ी ने हम सभी से कहा है –

कोई तो सूद चुकाए,कोई तो ज़िम्मा ले

उस इन्क़िलाब का,जो आज तक उधार-सा है।

जलेस की साथी ज्योत्सना अस्थाना

‘तरही मुशायरा’ इस बार कुछ मायनों में ख़ास रहा क्योंकि हमने दावत दी शहर के शायरों साथ कवियों को भी। तरही मुशायरा का उसूल होता है कि शायर के मिसरे की ज़मीन पर ग़ज़ल,नज़्म लिखें पर हमने इस बार इस उसूल से थोड़ी आज़ादी लेते हुए इसमें शामिल किये हिन्दी कवियों को भी और उनसे दरख़्वास्त की कि वे भी इस मिसरा को जेहन में रखते इस ज़मीन पर अपनी कविता लिखें। इसे पढ़ते हुए या सोचते हुए थोड़ा अजीब लग सकता है पर इसे करने के पीछे ख़ास वजह थी कि एक ही महफ़िल में कैसे हिन्दी कविता और ग़ज़ल/नज़्म हम सुन सकें और कैसे कुछ नई ज़मीन तैयार कर सकें। कैफ़ी आज़मी हरदिल अज़ीज़ हैं उनके क़लाम से हम सभी इत्तेफाक़ रखते हैं तो क्यों न वो राह बनाई जा सके जिसमें हम अपने क़लाम,कविता से उन्हें याद कर सकें।

10 मई,2026 का यह मुशायरा जो कैफ़ी की याद में किया उसमें तीन पीढ़ी के 13 शायरों और 5 कवियों ने अपने क़लाम,कविता से महफ़िल को चार चाँद लगाया। सुजल,रूपेश,सौरभ अस्थाना,गुलिस्तान,अजय महताब,संजय सोलोमन,नज़ीर अहमद नज़ीर,असर भागलपुरी,हातिम नवाज़,सईद अहसन, प्रशान्त,मो. फ़ैयाज़, ज्योत्सना अस्थाना,रिजवान औरंगाबादी, शैलेन्द्र अस्थाना, गौहर अज़ीज़,अहमद बद्र, अनवर अदीब और सैयद शमीम मदनी शामिल हुए। इस मुशायरा की सदारत की जनाब अनवर अदीब ने और मेहमान-ए-ख़ुसूसी थे चर्चित कथाकार राकेश मिश्र।  

मुशायरा के लिए तीन मिसरा ए तरह दिया गया था जो हैं –

1/ नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता

2/ मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ जो कहते हैं उनको कहने दो

3/ कुछ बस्तियाँ यहाँ थी बताओ किधर गई ।

मुशायरा में शाहर के अलग-अलग संस्था, संगठन के साथी मौजूद रहे जिनमें हैं- अरुणा मिश्रा, नियाज़ अख़्तर,कॉमरेड शशि,हंसमुख, मो निजाम, छवि, अंजना, सहेन्द्र, नादिरा, रेशमा ज़बीन, मुख़्तार अहमद,विकास,नम्रता,वर्षा,मिसाल,श्रवण,प्रिया, राजकुमार,विकास करमाकर, खुर्शीद, के एल श्रीवास्तव,सत्यम के अलावा ढेर सारे लोग शामिल हुए ।

कुछ वीडियो आप iptajamshedpur@youtube चैनल में देख सकते हैं-

जनाब अहमद बद्र , अजय महताब
जलेस के साथी शैलेन्द्र अस्थाना
जनाब हातिम नवाज़
शायर मो . फ़ैयाज़
मुशायरा के बाद

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