मार्क्स

मार्क्स का जन्मदिन। दुनिया की बेहतरी के लिए जीने-मरने वाले मार्क्स का जन्मदिन। किसी को याद करने का इससे अच्छा दिन और क्या हो सकता है वो भी तब जब बच्चे साथ हों तो याद करने के लिए हमें अपनी उम्र की ऊंची सीढ़ी से थोड़ा नीचे उतरना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है कि बच्चों की समझ से बात कर पाएं। जब भी किसी ख़ास दिन को बच्चों के साथ मनाना होता है तो एक रचनात्मक तनाव तारी रहता है कि साझा की जाने वाली बातें वे जज़्ब कर पाएं और यह भी लगता है कि बच्चे कम से कम नाम और उनकी एकाध बात भी वे याद रख पाए तो संवाद सार्थक मान सकते हैं इस उम्मीद के साथ अगली बार की प्रतीक्षा फिर की जा सकती है कि जब पुनः बात दोहराई जाए जिससे वे कुछ और समझ पाएंऔर जानने का दायरा बढ़ा पाएं ।
इस वर्ष जब 17 फरवरी को ब्रूनो को याद किया था तो ब्रूनो के बारे में बात करने से पहले सभी बच्चों से बस यह पूछा था कि आप सबके लिए जन्मदिन के क्या मायने होते हैं? आज मार्क्स के जन्मदिन में उनकी कही बातें स्मृति में कौंधी तो लगा दर्ज़ करते चलूँ क्योंकि बड़े होने के बाद धीरे-धीरे चेतनशील बनने के बाद जन्मदिन मनाने के मायने कुछ अलग रूप लेंगे पर बचपन की स्मृतियों को यहाँ सँजो लेने के लोभ में हूँ सो जन्मदिन के मायने के जवाब मुझे उनसे मिले –
सबसे पहले सभी ने एक स्वर में कहा – बड्डे यानि गिफ़्ट ।
गुंजन – नए कपड़े और मंदिर ।
काव्या – घर को सजना और दोस्तो को केक खिलाना ।
साहिल – स्कूल में सभी को चॉकलेट और केक ।
श्रवण – केक,दोस्त ।
नम्रता – सेलिब्रेशन जैसा कि बर्थ डे सेलिब्रेशन होता है ।
सुरभि – घूमना, केक ।
सुजल – घूमना-फिरना ,दोस्तो से मिलना, मौज-मस्ती ।

मार्क्स के बारे में बात करने के लिए 5 मई को हमारे साथ ऑनलाइन शामिल हुए जे एन यू इप्टा और ए आई एस एफ के कॉमरेड संतोष। इनके साथ लिटिल इप्टा के साथी वर्षा,सुजल,नम्रता,श्रवण,अभिषेक,सुरभि, गुंजन,साहिल,निर्भय और साथी अंजना, श्वेता । कॉम संतोष ने बड़ी सहजता और सरलता से मार्क्स के जीवन और उनके विचार को बच्चों की समझ के अनुसार साझा किया। कुछ बिंदुओं पर उन्होंने बात की –
- हम लोग किसी को याद क्यों करते हैं ?
- वे कौन लोग हैं जिन्हें हम याद करते हैं ?
- दुनिया में कितने तरह के लोग हैं ?
- इतिहास और दर्शन क्या है ?
- मार्क्स और एंगेल्स की दोस्ती की मिसाल
संतोष ने बातचीत के अंदाज में बच्चों को उन महान लोगों बुद्ध, गांधी, अंबेडकर की याद दिलाई जिन्हें हम इसलिए याद करते हैं क्योंकि दुनिया को बदलने के सपने के साथ उनका लक्ष्य और सपना जुड़ा था ।
मार्क्स को याद करने से पहले हमें जान लेना होगा कि पूरी दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं-
एक जो सता रहे हैं,अमीर हैं जिन्हें हम उत्पीड़क या शोषक कहते हैं
और
दूसरे जिन्हें सताया जा रहा है वे गरीब हैं, उत्पीड़ित या शोषित हैं ।
इस तरह से दुनिया को देखने का नज़रिया देने वाले मार्क्स का आज जन्मदिन है जिनका जन्म जर्मनी में हुआ। जर्मनी में मार्क्स से पहले भी विद्वान हुए हैं जिनकी वजह से इस देश को पहचाना जाता है । होम्योपैथ के जनक डॉ. सैमुअल हैनिमैन यहीं के थे। मार्क्स के पिता वकालत करते थे तो वे चाहते थे कि मार्क्स भी वकालत पढ़ें ,वे पढ़ने गए पर उसके बाद वे इतिहास और दर्शन का विशद अध्ययन कर समाज- वैज्ञानिक बनें । उन्होंने जर्मनी में ही पी एच डी की डिग्री हासिल की ।
इतिहास वो है जिसमें हम बीत चुके समय के बारे में पढ़ते हैं जिसमें कौन राजा था, कौन सी लड़ाइयाँ हुई या बीते समय में कौन सी महत्वपूर्ण तिथियाँ रही ।
वहीं दर्शन में पढ़ते हैं – हम कौन हैं? क्या करते हैं? हम कहाँ से आए जैसे बहुत से सवाल आते हैं जिन पर बात करते हैं, जीवन के बारे में चिंतन दर्शन कहलाता है।
मार्क्स के पहले जर्मनी में दो दार्शनिक थे – हेगेल और फायरबाख। हेगेल आदर्शवादी,भाववादी दर्शन की बात किए जिसमें उन्होंने कहा कि पहले दुनिया में विचार आया और उसके बाद पदार्थ आया ।
मार्क्स ने हेगेल के दर्शन को उलट दिया और बताया कि पदार्थ दुनिया में पहले से मौजूद था और विचार बाद में आया । उन्होंने हेगेल के दर्शन को जो सिर के बल खड़ा था सीधे करके पैरों पर खड़ा कर दिया । मार्क्स ने बताया कि समाज में हम जो देखते हैं,विचार करते हैं ,समाज से जो ज्ञान लेते हैं उससे आगे का सोचते हैं।
मार्क्स के पहले भी बहुत से दार्शनिक दुनिया में रहे जिनके चिंतन से मनुष्य यहाँ तक पहुंचा कि
- दुनिया बनीं कैसी?
- पूरी दुनिया को ईश्वर ने बनाया।
- किसी ने कहा दुनिया 7 दिन में बनीं।
- किसी ने अल्लाह को इसकी देन बताया, इस तरह लोगों ने अपने राय रखी, बात रखी जिस पर अंध विश्वास कायम रहा और अभी भी वो मौजूद है।
मार्क्स ने इतिहास और दर्शन को मिलाकर हमें बताया कि इस दुनिया को कौन बनाया और यह कैसे काम करती है? दुनिया के बनने पर बहुतों ने बात की पर इसे बदलने की बात मार्क्स ने की ।
मार्क्स ही वो शख़्स हैं जिन्होंने बताया कि इस दुनिया को हम जैसे देख रहे हैं , जहाँ रह रहे हैं उसे मज़दूरों ने बनाया।
हम इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया पर सच्चाई यह है कि उसे बनाया सैकड़ों मजदूरों के श्रम ने जिनका कहीं ज़िक्र नहीं। मार्क्स ने दुनिया को बदलने,बेहतर बनाने की थ्योरी दी जिसे हम वैज्ञानिक समाजवाद कहते हैं। मार्क्स की थ्योरी को लागू किया लेनिन और माओ ने । मार्क्स की इस थ्योरी में उनके जिगरी दोस्त एंगेल्स का बहुत बड़ा योगदान है जिन्होंने बताया कि परिवार कैसे बनें? इसके साथ ही नारा दिया कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हों ।

एंगेल्स ने बताया – जब लोग मिलकर एक परिवार बनाए तो धीरे-धीरे उनके पास सामान हुआ, किसी परिवार के पास ज़्यादा तो किसी के पास कम सामान रहा । यदि 100 में से 5 लोगों के पास ज्यादा सामान रहा और 95 लोगों के पास कम तो इससे शासन पैदा हुआ। किसी को अपने शासन में रखने का प्रचलन बना। निजी संपत्ति इस तरह से बनीं । निजी संपत्ति कैसे पैदा हुई, सरकार कैसे बनीं इस तरह की महत्वपूर्ण जानकारी हमें एंगेल्स से मिलीं , जब निजी संपत्ति किसी के पास होती है तो वो बलशाली हो जाता है और अपने अनुसार नियम चलाता है ।
मार्क्स ने एंगेल्स की निजी संपत्ति और परिवार को जोड़कर मार्क्स ने अपनी थ्योरी प्रस्तुत की जिसे वैज्ञानिक समाजवाद नाम दिया। उन्होंने बताया कि प्रकृति में मौजूद तमाम चीज़ें हम सबके लिए हैं जैसे ज़मीन, प्राकृतिक संसाधन। ज़मीन पैदा नहीं की जाती इसलिए हम सबको समान उपयोग के लिए मिलनी चाहिए उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह से कुछ लोग ज़मीन पर कब्ज़ा करके , नियंत्रण करके शोषक बन जाते हैं और बाकी लोग शोषित। बराबरी से सबको ज़मीन का उपयोग और प्राकृतिक संसाधन कैसे मिलेगा और यह कैसे संभव होगा यह हमें बताया मार्क्स ने। मार्क्स ने हमें बराबरी का मतलब बताया । बराबरी का ये मतलब कि जिसे जिस चीज की जितनी ज़रूरत है उसे मिलें न कि ये कि ज़रूरत न होने पर भी अपना भाग मिलना। इसके लिए एक उदाहरण दिया कि पढ़ने के लिए सभी बच्चों को साइकिल मिली पर उनमें से एक बच्चा जो पैरों से या हाथ से अशक्त है उसे भी साइकिल मिलेगी तो ये बराबरी का उदाहरण नहीं होगा क्योंकि उसे साइकिल की जगह उसकी ज़रूरत पूरी करने वाली ट्राई साइकिल या परिवहन साधन की सुविधा मिलनी चाहिए।

बच्चों की दुनिया में मस्ती के साथ सजगता किस तरह से आए इसके लिए हमारे आसपास काम किए जाने की आवश्यकता है । जब मार्क्स के बारे में सोच रही थी तो लग रहा था कि उनके जीवन से जुड़ी बातों को जिनसे बच्चे अपने को जोड़कर देख पाते हों बिल्कुल वैसी बातों से मार्क्स के जीवन और विचार को रखने से वे कुछ समझ पाएंगे और अगर कुछ नहीं भी याद रह पाएगा तो कम से कम मार्क्स और एंगेल्स की दोस्ती और नाम तो उनके साथ उनकी स्मृति में टंक जाएगा पर कल जब साथी संतोष ने बच्चों के साथ मार्क्स के बारे में बताया तो हम एक कदम आगे बढ़ गए ।
बच्चों के लिए इस दिशा में कुछ बाल पत्रिकाएं बहुत गंभीरता से काम कर रही हैं जिनकी वजह से बच्चे गांधी, अंबेडकर, अलग-अलग श्रमिकों के बारे में,बच्चों के लिए संविधान और कानून को जानने के लिए लिखी गई किताबों को पढ़ पा रहे हैं इन किताबों को बच्चों के लिए लिखने का अंदाज़ शानदार है बस दिक्कत यह है कि आज के बाज़ार में उनकी कीमतें बहुत ज़्यादा है तो फिर वहीं बात अटकती है कि सिर्फ कुछ ख़ास वर्ग तक ही ये साहित्य पहुँच पाएगा क्योंकि उतनी लायब्रेरी नहीं है और अगर लायब्रेरी हो भी तो बच्चों के साथ पढ़ने वाले, उनके साथ संवाद कर अपनी और उनकी समझ बनाने वाले कम है। बच्चों के बीच निरंतर काम करने, पढ़ने और संस्कृति कर्म करने की दिशा में कोशिशों को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है जिससे वे सजग होकर युवावस्था में प्रवेश करें और उनके भटकने की संभावना के दरवाज़े गायब हो जाएं ।


नज़ीर अहमद की टिप्पणी
कोई इनाम मिल ही जाएगा
और नीचे उतर के देखेंगे।
रवि पासवान
विचारो की ज्वाला लेकर
जग में जो प्रकाश हुआ
श्रमिको के अधिकारो का
जिसने सशक्त विकास किया
अन्याय के विरुद्ध उठी ,
उसकी लेखनी की पुकार
मार्क्स के सिद्धांतों से बदला
जग का हर विचार
अनंत शुभकामना के साथ
जिंदाबाद साथी
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏👌