साहिर की याद में

साहिर की 105 वीं जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक रवायत नहीं बल्कि उनके बेहतर दुनिया देखने और जीने के अंदाज़ को सीखने की छोटी सी कोशिश है और एक छोटा कदम है।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच की पैदाइश हैं साहिर लुधियानवी। उस दौर में बड़े होते साहिर पर इसका असर साफ दिखता है और इसकी परछाइयां उनकी शायरी में हम महसूस करते हैं इस ज़रूरी समय को याद करते हुए गोष्ठी की निज़ामत की कहानीकार नियाज़ अख्तर ने ।

साहिर को याद करने की वजहें उस दौर में भी थी जब वे थे और आज के समय में इसकी ज़रूरत बढ़ गई है। इस याद में हम अपने समय के अंधेरों को समझने और उन्हें रौशन करने के नए तरीकों को ईजाद कर सकते हैं बशर्ते हममें उन्हें जीने की सलाहियत हो।साहिर के जीवन और उनके शायराना फ़लसफ़े पर बात रखी संजय सोलोमन ने। इसके बाद लिटिल इप्टा ने साहिर की नज़्म ‘ऐ वतन की सरज़मीं’ प्रस्तुत किया।

अपर्णा ने साहिर का नया दौर का गीत ‘ साथी हाथ बढ़ाना, साधना फिल्म का औरत ने जन्म दिया मर्दों को’ लीडर फिल्म की नज़्म ‘ एक शहंशाह ने बनवा के ताजमहल ‘ माध्यम से अपनी बात रखी। गीतों में जीवन, प्रेम, सौंदर्य, शोषण, स्त्री, पूंजीवादी समाज और दुनिया पर संक्षिप्त बात रखी। उन्होंने बताया कि साहिर के गीतों से परिचय पुराना है पर उनके जीवन से परिचित नहीं थी तो इस जयंती के साथ वे साहिर को पढ़ते हुए उनके जीवन से परिचित हुईं । इप्टा की कोशिश रहती है कि छोटी गोष्ठियों के माध्यम से हम ख़ास दिन को लोगों तक पहुंचा पाएं।

इसके बाद लिटिल इप्टा ने साहिर की नज़्म ‘भारत के बच्चों की प्रस्तुति की । हारमोनियम में पार्थों ने और तबला में सुजल ने संगत किया।

पार्थों ने साहिर को उस दौर के इतिहास से जोड़ते हुए शायर के उन पहलुओं पर बात की जिनसे वे मुतासिर हुए। जब आध्यात्मिकता लोगों की रचना के केंद्र में थी उस दौर में साहिर का 22 वर्ष में ‘तल्ख़ियां’ का प्रकाशन साहिर के मिज़ाज को ज़ाहिर करता है। नूरजहां जो मुगल इतिहास की एकमात्र महिला शासक बनीं उन्हें साहिर ने क्यों नज़्म में दर्ज़ किया, इसके अलावा ‘कभी-कभी’ नज़्म का वो बंद भी सुनाया जो सामान्यतः इस नज़्म के साथ पढ़ने नहीं मिलता है।

कार्यक्रम के आख़िर में अहमद बद्र साहब ने उनके कुछ संस्मरण सुनाए जो साहिर की हस्ती को खोलते हैं। देश के दो फांक में बंटने का दर्द जिस पीढ़ी ने जीवन भर जिया उनमें से एक थे साहिर। आज के कार्यक्रम का संचालन किया कहानीकार नियाज़ अख़्तर ने। धन्यवाद ज्ञापन किशोर साथी वर्षा ने दिया।

आयोजन में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, पथ नाट्य संस्था, ए आई एस एफ,साझा नागरिक मंच, कौमी एकता मंच, निश्चय फाउंडेशन और इप्टा के साथियों की भागीदारी रही।





