लिटिल इप्टा की डायरी

साहिर के साथ – १

साभार – साहिर को याद करते स्त्री मुक्ति संगठन दिल्ली का बनाया एक बैग

कविता के आँगन में बसर करना

कविता से बात करना

कविता के साथ मौन चलना

कविता के साथ रोना-हँसना

और

कविता से दिल की बात करना

ऐसा एहसास है

जिसमें किसी बहती नदी सा बहते हुए

वहाँ पहुँचते हैं

जिसकी चाह करते हैं।

अपने हर एहसास को

कविता में पाने की खुशी

और

ग़म की दास्ताँ है कविता

सुबह से शाम तलक

शाम से देर रात तलक

तमाम कोमल भावनाओं की पहेली

सुलझाने का नाम है कविता।

जीवन से जुडी हर पहेली का

जवाब है कविता।

यदि यह कहूँ कि कविता वो कांधा है जिस पर हम सर रखकर हसीन कल्पनाओं में खो सकते हैं तो आंसुओं की धार से उस काँधे को नम भी कर सकते हैं। सच मानिये! कविता आपको ढूंढ लेती है और आप उसके हमसफ़र बन जाते हैं चाहे आप कविता लिखे या न लिखें।

कविता को आगे ले जाने वाले पूरी दुनिया के तमाम लोगों तक ये आवाज़ पहुँच न पहुंचे पर यह दर्ज़ करना ज़रूरी है कि कविता हमें हर रोज़ थोड़ा और इंसान बनाती है, इंसानियत और हक़ के लिए खड़ा होना सिखाती है और प्यार करने के जज़्बे को गाढ़ा, सांद्र करती है। पूरे दुनिया के लोगों तक कविता रोज़ पहुँचती है,दस्तक देती है कि एक अदद नज़र हम उस पर डालें, महसूस करें।

साभार – द अम्ब्रेला क्रिएशन्स

इन तमाम बातों को करने के पीछे वजह हैं मेरे प्यारे नन्हे साथी जिनके साथ कोशिश रहती है कि बाल पत्र-पत्रिकाओं की कविता पढ़ें और उनकी समझ को समझने की कोशिश करें। बहरहाल साहिर लुधियानवी के यौमे पैदाइश की तारीख़ ८ मार्च नज़दीक है सो कोशिश है कि साहिर की बच्चों को सम्बोधित चंद नज़्मों-गीतों को पढ़ सकें। यह पोस्ट लिखे जाते तक हम लोगों ने ३ नज़्में पढ़ी हैं जिन्हें उनकी नज़र से पढ़ने और देखने की ज़रुरत है। कुल जमा १० नज़्में लिस्ट में हैं पर सब पढ़ पाएं इसकी बस उम्मीद कर सकते हैं। यह मज़ेदार बात रही कि पढ़ने के लिए निकाली रचनाओं को बस पढ़ा पर बाद में ढूंढने पर उनका फिल्मांकन भी मिला, एक तरह से अच्छा हुआ कि हम लोगों ने उन्हें पहले पढ़ा,समझा।

फिलहाल पहली रचना पेश है –

ओ बच्चो सुन लो बात
साहिर लुधियानवी

ओ बच्चो सुन लो बात

बुड्ढे बाबा से
कुब्ड़े चाचा से

बढ़ के मिला लो हात
ओ बच्चो सुन लो बात

आया हूँ मैं दूर गाँव से
थोड़ा रेल से थोड़ा पाँव से

मेरी दाढ़ी में जितने बाल हैं
मेरे पास उतने कमाल हैं

ओ बच्चो सुन लो बात
जूँही बोल दूँ इक दो तीन मैं

फिर से भेज दूँ तुम को चीन मैं
जो बजाऊँ मैं अपनी बीन को

चाकलेट कर दूँ ज़मीन को
ओ बच्चो सुन लो बात

मेरे क़ाबू में चार भूत हैं
चारों भूत रुस्तम के पूत हैं

मेरे भूतों से जीते जंग जो
उस का ब्याह शहज़ादी संग हो

ओ बच्चो सुन लो बात।

निश्चित ही इस गीत को किसी फिल्म (फिल्म-भाई बहन,१९५९ )की सिचुएशन के लिए साहिर द्वारा लिखा गया है पर इन सब बातों से अनभिज्ञ लिटिल इप्टा के नन्हे-किशोर साथियों की प्रतिक्रियाएं मज़ेदार और ज़रूरी हैं। कोई गीतकार के लिखने के मानी में कितना विस्तार होता है यह हमें तब पता चलता है जब अलग-अलग पाठक उसे विश्लेषित करते हैं। ‘ओ बच्चों सुन लो बात’ कविता के लिए कुछ शब्दों के अर्थ को बच्चों से पूछा-

जैसे इस कविता में दाढ़ी, कमाल, चीन का सन्दर्भ के बारे में पूछा तो बताया कि दाढ़ी को बच्चों ने अनुभव से जोड़ा और कमाल यानी बहु बढ़िया और कविता में चीन के लिए बताया कि तज़ुर्बे की वजह से बुड्ढे बाबा हमें कहानियों के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में ले जा सकते हैं।

रुस्तम के मायने उन्हें बताया बहादुर। गीत में रुस्तम के चार पूत बताये – determined, ज्ञान , विवेक , निडर , ज़िम्मेदार सक्षम , सम्मान देना , हह करने का जज़्बा जो चाहे चार पूत हो सकते हैं। सब बच्चे एक-एक भाव बताये जिसे सुनकर लाजवाब हुई।

साहिर छोटे बच्चों को बता रहे हैं कि बड़े लोगों से बच्चे डरते है पर साहिर कह रहे हैं बड़ों से तुम हाथ मिला लो। उनके साथ बात करो। उनकी जितनी दाढ़ी है उनमें उतना ज्ञान है,उनके पास उतनी कहानियां हैं क्योंकि वे तुमसे ज़्यादा दुनिया देखे हैं। वे ऐसी कहानी सुनाएंगे कि तुम चीन पहुँच जाओगे। बहादुर पूत के बारे में श्रवण ने कुछ उदाहरण दिए जैसे बिरसा मुंडा,भगत सिंह,गांधी जी,सुभाष चंद्र बोस. उनमें अहिंसा और सम्मान था, सहनशील थे।

अगली कविता पढ़ी हिन्दोस्तानी बच्चे –

हिन्दोस्तानी बच्चे
साहिर लुधियानवी

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की

बापू के वरदान की नेहरू के अरमान की
आज के टूटे खंडरों पर तुम कल देश बसाओगे

जो हम लोगों से न हुआ वो तुम कर के दिखलाओगे
तुम नन्ही बुनियादें हो दुनिया के नए विधान की

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की
जो सदियों के बाद मिली है वो आज़ादी खोए न

दीन धरम के नाम पे कोई बीज फूट का बोए न
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इंसानी जान की

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की
फिर कोई जय-चंद न उभरे फिर कोई जाफ़र न उट्ठे

ग़ैरों का दिल ख़ुश करने को अपनों पर ख़ंजर न उट्ठे
धन दौलत के लालच में तौहीन न हो ईमान की

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की
बहुत दिनों तक इस दुनिया में रीत रही है जंगों की

लड़ी हैं धन वालों की ख़ातिर फ़ौजें भूके नंगों की
कोई लुटेरा ले न सके अब क़ुर्बानी इंसान की

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की
रह न सके अब इस दुनिया में युग सरमाया-दारी का

तुम को झंडा लहराना है मेहनत की सरदारी का
हल हों अब मज़दूरों के और खेती हो दहक़ान की

बच्चो तुम तक़दीर हो कल के हिन्दोस्तान की।

इस कविता को बच्चे आसानी से समझे सिवाय जयचंद और जाफ़र के सन्दर्भ को छोड़ जिसके प्रति जिज्ञासा हुई, बताने पर वे इस मेटाफर को समझ पाए। इसके अलावा सरमायादारी पर भी बात हुई। इस पर रमन ने बच्चों को बच्चों की समझ के हिसाब से उदाहरण देकर समझाया कि पूंजी क्या है,मुनाफ़ा क्या है,मजदूर कौन है और पूंजीवाद क्या है ?

सरमायादारी समझाते साथी रमन

कविता में आए ‘ईमान’ शब्द का अर्थ पूछने पर कहा सुना तो है यह शब्द पर मायने नहीं पता जैसे ही कहा कि विश्वास , यकीन और जैसे ही उनसे कहा कि अब आप अपना ईमान बताइये तो उनके सवाल के जवाब उनकी समझ, मासूमियत और ईमानदारी से भरे आये –

अभिषेक- सच्चाई के रास्ते में चलना। मदद करना। समय से स्कूल जाना और किसी को भी मारना नहीं मेरा ईमान है दीदी ।

नम्रता – सच्चाई के रास्ते पर चलना,मदद करना।चाहे कोई कुछ भी करे धोखा नहीं देना ,चोरी नहीं करना।

सुरभि – ज़ात-धर्म देखकर दोस्ती न करना और गलती में साथ न देना।

साहिल –कोई किसी को मारता है तो साथ नहीं देना। बुरे लोगों से दोस्ती नहीं करना।

श्रवण – लड़ाई – झगड़े में साथ न देना , ऊंच-नीच नहीं देखना ।

दिव्या – संगति कैसी भी हो सही रास्ते पर चलना ।

सुजल – किसी को दुखी करके खुश नहीं होना। मदद करना। बुरे बात कहना नहीं और न ही सिखाना।

बहुत संभावना है कि कविता बच्चे और इनमें मैं भी शामिल हूँ पूरी याद नहीं रख पाऊं पर इसे पढ़ने के दौरान जो जीवन से जुडी , अनुभव से महसूस की हुई ,जज़्ब किया वो कहीं अचेतन में अपनी उपस्थिति रखेगा और उम्मीद रहेगी कि वे इन कविताओं से अपने जीवन को जोड़कर देख पाएंगे और इसका अभ्यास कर पाएंगे।

यहां यह जोड़ती चलूँ कि फरवरी १३ को फ़ैज़ को याद करने की तैयारी की थी और उस दौरान फ़ैज़ का पंजाबी में लिखा ‘तराना एक किसान के लिए’ पढ़ा तो लगा इसे तैयार करना चाहिए और तुरंत ही इसे बार-बार पढ़ने के दौरान धुन बनीं। किसी शाम वर्षा से कहा कि इसकी धुन बनाने की कोशिश करो तो उसकी कोशिश कामयाब हुई और उसने अपनी पहली धुन बनाई। मज़े की बात यह कि हम दोनों की धुन एक ही है।इसी कोशिश में एक कोशिश और जुडी जो महत्वपूर्ण है , लगभग २० – २५ दिनों से दिव्या को कह रहे थे कि तुम इस पंजाबी तराने को ओड़िया में लिखने की कोशिश करो और उसने कोशिश की। इसी क्रम में साथी रमन ने एक नज़्म ‘ये फ़स्ल उम्मीदों की हमदम ‘ पर धुन बनाई। किसी ख़ास दिन को मनाने की यह प्रक्रिया कि उन खास लोगों (लेखक,कवि, कलाकार, क्रांतिकारी) के बारे में बच्चों के साथ पढ़ना और कुछ नया गाने की कोशिश करना ही हमेशा मक़सद होता है कभी इसमें कई नै बातें जुड़ जाती हैं जैसा कि इस बार के आयोजन का हासिल रहा। आपके लिए जमशेदपुर इप्टा के बच्चों द्वारा और युवा साथी रमन द्वारा फ़ैज़ का लिखा तराना और नज़्म आगे के लिंक में साझा कर रही हूँ –

https://www.youtube.com/watch?v=RlBG6o_Pe5Y

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लिखा पंजाबी तारायण ‘एक किसान के नाम ‘

https://www.youtube.com/watch?v=MY6j_UkPMrI

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की लिखी नज़्म ‘ये फ़स्ल उम्मीदों की ‘ ( https://www.rekhta.org/nazms/ye-fasl-umiidon-kii-hamdam-sab-kaat-do-faiz-ahmad-faiz-nazms?lang=hi)

One thought on “साहिर के साथ – १

  • SUSHMA SINHA

    बहुत महत्वपूर्ण कार्य
    इप्टा जमशेदपुर के बच्चों को और आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ♥️

    Reply

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *