मनुष्यता की मुहिम

समय के साथ कैसे चलें, समय से आगे कैसे चलें इस सवाल से दो-चार होना आम बात है इस चिंतन में हम अपनी राह बनाते चलते हैं या जो सामने आ रहा होता है उस पर आगे बढ़ रहे होते हैं। ये दुविधाएं आम इंसान की होती हैं। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए कमर कसे ख़ास लोग अपने जीवन का पल-पल मनुष्यता को जीने और विस्तार देने में लगे होते हैं। उनके मौन में जीवन के ऐसे अनुभव जज़्ब होते हैं जो लोगों तक पहुँच नहीं पाते जबकि उनकी यात्रा,अनुभव हमारे लिए ज़रूरी होते हैं जिससे दृष्टि को विस्तार मिले। इसके लिए माध्यम बनीं सुपरिचित कवयित्री जसिंता केरकेट्टा जो साइकिल में जान दराज़ यानी ज्यां द्रेज़ के बारे में लिख रही हैं। हाल में साइकिल में आए अंक में तीसरी कड़ी आई है।

डायरी का अंश पढ़ने से पहले खलील जिब्रान की बात –
The city has turned into a battlefield where the strong wrestle down the weak and the rich exploit and tyrannise over the poor.— Kahlil Gibran
जान दराज़ ने जो काम किया वो हम सब जानते हैं पर बच्चों को उनसे परिचित कराने का काम आसान नहीं है। बच्चों की समझ में रोचक-सरल ग्राह्य लिखना आसान नहीं और उसकी कसौटी बच्चे ही हैं। यह लिखते हुए बच्चों का सन्दर्भ साझा करना चाहूंगी। आज जब जान दराज़ की डायरी का तीसरा अंक पढ़ने वाली थी तो पूछा याद है जान दराज़? कुछ सेकंड्स में छोटे बच्चों ने फट-फट उनसे जुड़े किस्से साझा किये कि कैसे उनकी साइकिल की घंटी अँधेरे रास्तों में लाइट का काम करती है , कैसे घर में रहते हैं और चूहे के प्रति जान दराज़ की चिंता और ऐसी कई बातें जबकि उन किस्सों को काफी पहले पढ़ा था। आप चाहें तो इन्हें यहां पढ़ सकते हैं –
अक्टूबर-नवंबर २०२५ के साइकिल के अंक में लम्बी प्रतीक्षा के बाद जान दराज़ की डायरी का तीसरा अंक प्रकाशित हुआ। इसमें उनके १९८९ के लन्दन प्रवास का ज़िक्र है जिसमें वे लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में लेक्चरर के पद पर काम कर रहे थे। लन्दन के कुछ युवाओं ने खाली पड़े भवनों में बेघर लोगों को छत मुहैया कराने की अनूठी पहल शुरू की जिसे नाम दिया गया ‘बेलग्रेव होमलेस प्रोजेक्ट ‘ शुरुआत चूंकि एक सरकारी अस्पताल बेलग्रेव के खाली पड़े भवन से हुई सो इसका नाम उस अस्पताल पर पड़ा। बेघर लोगों के बीच उस घर में रहने के लिए युवाओं ने पर्चे बांटे और खाने की व्यवस्था का भरोसा भी दिलाया। उस दौरान युवाओं की इस मुहिम से ज्यां द्रेज़ भी जुड़े और कुछ दिन उस अस्पताल में रहे। इस अनुभव ने उनके जीवन का नज़रिया बदल दिया। बेरोज़गार,पढ़ाई छोड़ चुके युवा,पूर्व कैदी,चोर, भीख माँगने वाले लोग रहने आए। यह कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी क्योंकि युवाओं को पता था कि आज नहीं तो कल अस्पताल को खाली कराने प्राइवेट कंपनी आएगी और इस जगह को खाली कर दूसरी खाली जगह ढूंढना होगा पर इस मुहिम से जुड़े लोग और उनका अल्प प्रवास पूरे लन्दन में और अख़बारों में चर्चित रहा।

इस डायरी के अंश को पढ़कर बच्चों की प्रतिक्रियाएं आई जो रोचक हैं –
अभिषेक – १९८९ में लन्दन में जान दराज़ रहते थे। वे लोग जिनका घर-द्वार नहीं था वो लोग मिलजुलकर रहते थे। कभी-कभी झगड़ा भी करते थे। धीरे-धीरे कुछ काम भी करने लगे। उस घर में चोर, जिसकी पढ़ाई छूट गई थी वे भी रहते थे। यह समझ आया कि सब लोग मिलजुल कर रहते थे। अपना परिवार नहीं भी था तब भी सब लोगों को बचाया। जान दराज़ को जब इसके बारे में पता चला तो वो भी वहाँ रहे। जब उन लोगों को पता चला कि वहाँ से हटा दिया जा रहा है तो वो लोग बहुत दुखी हो गए थे क्योंकि अस्पताल किसी प्राइवेट कंपनी को दे दिया गया था।
यह यह लिखना ज़रूरी है कि अस्पताल खाली करने और लोगों के दुखी होने का ज़िक्र डायरी में नहीं है पर इसे अभिषेक ने बताया। ज़िन्दगी से जुड़ी बातों के पढ़ने का असर किस तरह से बालमन पर पड़ता है ये उसकी बानगी है।
श्रवण – हमको यह समझ आया कि जिसे देख लोग घिन करते हैं हिकारत से देखते हैं वो लोग रहते थे पर हम लोगों को ऐसे नहीं देखना चाहिए।
गुंजन – जान दराज़ बेघर लोगों के साथ शामिल हुए , उनके साथ रहे भी। जब आग लगी तो जो लोग मिलकर रहते थे जिनका कोई रिश्ता भी नहीं था तब भी दो लोग अंदर सो रहे दोस्त को बचाने के लिए गए। वे सब लोग मिलकर रहते थे कभी झगड़ा भी करते थे। कोई खाना बनाता था तो कोई बर्तन धोता था तो कोई रात में पहरेदारी करता था।
काव्या – कुछ लोगों ने रोड में रहने वाले जो लोग थे उनको एक बंद अस्पताल में रहने के लिए जगह दी। उनके साथ जान दराज़ भी रहे। हमको यह अच्छा लगा कि अभी जान दराज़ आदिवासी लोगों के साथ रहते हैं।
साहिल – मुझे यह समझ आया कि जान दराज़ …….. लंबा अवकाश हुआ तो अभिषेक ने साहिल को कहा कि कहानी में क्या अच्छा लगा यही बता दे साहिल, तब साहिल ने अपनी बात कही –
जान दराज़ ने सबकी मदद की।
नम्रता – जान दराज़ को आदिवासियों के साथ रहना अच्छा लगता है। मुझे यह समझ आया कि जिनके पास घर नहीं था वे लोग एक साथ मिलजुल कर रहे तो हम लोगों को भी मिलजुल कर रहना चाहिए। जान दराज़ भी उनके साथ रहे।
ध्रुव – जान दराज़ लन्दन स्कूल इकोनॉमिक्स में लेक्चरर थे। उनके बारे में पढ़कर ऐसा लगता है कि उन्हें नई बातें ट्राई करने का बहुत शौक था। नई-नई जगहों में जाकर स्टडी करने का शौक था। होमलेस प्रोजेक्ट में जानकारी के लिए शामिल हुए तो उन्हें यह पता चला कि जिस सोसाइटी में रहते हैं वहाँ कई लोगों को रहने की जगह नहीं दी जाती है क्योंकि वे नार्मल लोगों से अलग रहते हैं ( नॉर्मल लोगों पर बाद में बात की ) सोसाइटी के लोगों को उनसे घिन आने लगती है उनको उपेक्षा से देखा जाता है हम लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए। इसमें यह भी बताया गया है कि जो लोग उपेक्षित होते हैं वे लोग भी कुछ करने के काबिल होते हैं।
सुजल – जब जान दराज़ लन्दन में थे तो यह होमलेस प्रोजेक्ट शुरू हुआ था तो युवाओं के साथ वे गए,हिस्सेदारी की। अगर हमें किसी चीज़ को, किन्हीं लोगों के बारे में जानना है उनके बारे में समझना है, उनसे अपना परिचय करवाना है तो साथ रहकर ही पता चल सकता है। जैसे ज्याँ द्रेज़ अभी आदिवासी लोगों के साथ रह रहे हैं उस समय वे उन लोगों के साथ रहे जिन्हें लोग उपेक्षा करते हैं। इससे उनको पता कि उन्हें अलग कर दिया गया है और उनके पास अपनी क्वालिटी है मतलब जो अलग कर देते हैं वे अलग हो जाते हैं पर साथ रहते हुए वे साझेदारी निभाते हैं और जिनका आपस में कोई रिश्ता नहीं होता उनके बीच मानवता का रिश्ता होता है। जैसे इसमें एक घटना का वर्णन था कि उनका एक साथी आग में सोया था तो उसको बचाने के लिए अंदर गए। साथ में रहते-रहते एक बॉण्ड बन जाता है तो इसमें वही था।
दिव्या – इसमें युवाओं का एक ग्रुप था जिन्होंने बेघर लोगों के लिए जितना कर सकते थे उन्होंने मिलकर किया। रहने के लिए घर दिया । पहले-पहले सब एक-दूसरे से अनजान थे पर बाद में रहते हुए वे एक परिवार जैसे हो गए थे। वे लोग किसी को अलग नहीं मानते थे और टीम वर्क करते थे। इसे पढ़कर यह भी लगा कि हम लोग अगर किसी के लिए कुछ कर पाते हैं तो करना चाहिए। किसी की मदद करना चाहिए। किसी को भी अलग नज़र से नहीं देखना चाहिए क्योंकि सभी की अलग – अलग पर्सनॅलिटी होती है तो उसे देखकर अलग नहीं मानना चाहिए , ग़लत या छोटी नज़र से नहीं देखना चाहिए।
सभी की बात रखने के बाद उनसे सवाल किया कि नॉर्मल लोग कौन होते हैं और एबनॉर्मल लोग कौन होते हैं ?
जो लोग औरों के साथ गरिमाहीन व्यवहार करते हैं या लोगों के प्रति अमानवीय होते हैं वो असामान्य लोगों की निशानी है या हम लोग घरों में, परिवार में रहते हैं उस वजह से हम नॉर्मल हैं ? इस सवाल पर संक्षिप्त बात हुई जिसका प्रभाव धीरे-धीरे मानस पर होगा।
बच्चों ने मुहिम और हिकारत शब्द का परिचय पाया। बातचीत में यह बात की कि तुम लोग भी कोई मुहिम शुरू कर सकते हो , यह कोशिश अगर आगे कभी आकार ले तो जान दराज़ की डायरी का यह अंश जसिंता के लिखने की सार्थकता होगी और उम्मीद है कि कहीं न कहीं तो कोई न कोई मुहिम शुरू हुई होगी या होएगी और हम इसके हिस्सेदार बनेंगे।
इस पूरी बातचीत में जसिंता ने ज्याँ द्रेज़ के अनुभव को बड़ी सजगता से लिखा है जिससे मानवता के रिश्ते की बारीकी को बच्चे और बड़े दोनों महसूस कर पाएं। मानवता से जुड़ी किसी भी मुहिम को ऐसे किस्सों के जरिये पहुंचना कितना ज़रूरी है यह पढ़कर बेहतर समझ आया। इस डायरी को पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। साइकिल पढ़ते, बाल साहित्य की सामग्री पढ़ते हुए हमेशा से यह लगता है कि बालमन की संवेदनाओं में हर तार मौजूद है बस कोशिश यह होनी चाहिए कि हम उसे किस तरह से मनुष्यता के सुर से मिला पाएं क्योंकि बच्चों के साथ हम भी मानवीयता की उष्मा से चार्ज होते रहते हैं।
यह किस्सा १९८९ का है पर इस किस्से से गुज़रने के बाद जब अंतर्जाल में थोड़ा बेलग्रेव हॉस्पिटल और उससे जुड़े होमलेस प्रोजेक्ट के बारे में देखा तो लन्दन में स्थिति अभी भी पहले जैसी ही है कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है।बेघर लोगों के लिए कौन ज़िम्मेदार है यह सवाल आँख में आँख डालकर किये जाने की मुहिम की आवश्यकता है। यह सिर्फ लन्दन की कहानी नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में बेघरों के लिए कोई योजना नहीं है बस विकास की नई परिभाषाएं और पूंजी निवेश ही हर सरकार के एजेंडे में शामिल हैं।
कुछ लिंक जिससे हाल की बेघर लोगों से जुडी खबरों का अपडेट मिलेगा ।
