नई कलम

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है

अभिषेक और श्रवण मिलकर पढ़ते हुए

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है-कुंवर नारायण

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने
कभी हमसे पहले
कभी हमारे बाद

कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता
भाषा में उसका बयान
जिसका पूरा मतलब है सच्चाई
जिसका पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान

उसे कोई हड़बड़ी नहीं
कि वह इश्तहारों की तरह चिपके
जुलूसों की तरह निकले
नारों की तरह लगे
और चुनावों की तरह जीते

वह आदमी की भाषा में
कहीं किसी तरह ज़िन्दा रहे, बस…।

कुंवर नारायण की कविता वो सब कह दे रही है जो यहां दर्ज़ करने की छोटी सी कोशिश करूंगी और सही मायनों में कहा जाए तो उस पगडण्डी को लिख रही हूँ कि याद रहे कि किस पगडण्डी से बच्चों में कविता के प्रति थोड़ी जिज्ञासा या कह सकते हैं आँखों की चमक पैदा कर पाई। इस प्रक्रिया में सिर्फ माध्यम बनीं कविता जो किसी झरने सी बहती उन्हें अपनी रौ में बहा ले गई।

बच्चों के साथ कविता पढ़ना गाहे-बगाहे होता है जिसे नियमित करने की आवश्यकता लगती है।

हाल में जब १३ फरवरी को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे थे तो उस दौरान उनकी कुछ नज़्मों को ही बच्चों के साथ पढ़ पाए और सही तौर पर सिर्फ एक नज़्म ”ऐ वतन’ को बच्चों के साथ समझने और समझाने की कोशिश की। इस कोशिश को बेहतर तरीके से समझाने का काम किया संजय सोलोमन ने।

कैसे छोटी बातें अपार खुशी देती हैं इसका नमूना है यह प्रक्रिया जिसने मुझे ऐसे ही खुशी से भर दिया। हाल में प्लूटो में पंक्ति पढ़ी ‘पेड़ अगर चलते होते तो सभी से पूछा कि बताओ क्या हो सकता अगर पेड़ चलते होते तो। सबने कुछ-कुछ जोड़ा तो कहा कि सोचो और लिखो। बस ! इसी में सुजल, नम्रता,दिव्या और अभिषेक ने तुरंत ही कविता पूरी कर ली जबकि ध्रुव ने लिखी पर अभी भी उसे पूरा करने में लगे हैं। उनकी कविता सुनकर लगा कि बच्चों की कल्पना,अनुभव और संवेदना को उर्वर बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। जब इस तरह की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो तुरंत आइडिया आया कि इनके लिए कविता की कार्यशाला कराई जानी चाहिए , ढेर सारी कवितायें पढ़ी जानी चाहिए और बच्चों को कविता लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। वैसे इस ‘चाहिए ‘ की सीमा तय नहीं है बहुत कुछ करने का विचार जन्म लेता है उसमें बस कुछ ही आकार लेता है।

कविता पढ़ता नन्हा साहिल जो अभी जोड़ – जोड़कर पढ़ना सीख रहा है

फिलहाल बच्चों की कवितायें प्रस्तुत हैं-

पेड़ अगर चलते होते तो….

सुजल

पेड़ अगर चलते होते तो

अपने साथ कितनी कहानियां लेकर चलते

वो बताते कितने पशु – पक्षी , जीव – जंतु हैं उनमें रहते

वो तोते के अण्डे लेकर चलते

वो कोयल की मधुर ध्वनि सुनाते

और कठफोड़वे इसमें संगत करते ।

उसकी छाँव में लोगों का आराम होता

बच्चों की किलकारी साथ लेकर चलते

लकड़हारों की कुल्हाड़ी की चोट से बचते

पूंजीपतियों , उद्योगपतियों , भू – माफ़ियाओं के ख़िलाफ़

विद्रोह का कारवां लेकर चलते।

नम्रता

पेड़ अगर चलते होते तो

साथ – साथ चलते हम

चलते हुए फल खाते हम

गर पेड़ भी चलते तो

कितने मज़े हमारे होते

खेल – खेलकर हम गाते

गाते – गाते नाच दिखाते

कितने मज़े हमारे होते

सबको जाकर नाच दिखाते

मन करता तो पेड़ के साथ

हर जगह पर हम उग जाते

मन करता तो पेड़ पर हम

चिड़ियों के साथ हम गाना गाते।

दिव्या

पेड़ अगर चलते होते तो

कितना अच्छा होता

गर्मी में उनको आँगन में बुलाती

छाँह में बैठ नरम हवा को गले लगाती

पता है

स्कूल जाने के रास्ते में एक पेड़ रहता था

तब उसको मैं स्कूल ले जाती

और नरम छाँह में लंच करती ।

पेड़ अगर चलते होते तो

मैं उनसे दोस्ती कर लेती

जब उदास होती तो

उनके गले लगा के रोती

पेड़ अगर चलते होते तो

मैं उनसे ढेर सारी बातें करती

जो बातें किसी से न कह पाती

वो सारी बातें मैं उसको बताती ।

पेड़ अगर चलते होते तो

जब अपनी परेशानियों की आग से जलती होती

तो उनकी टहनी में बैठकर जलते सूरज को डूबते देखती

पेड़ अगर चलते होते तो

तेज हवा में ख़ुद को टूटने न देते

टूटकर गिर जाने का दुख कभी भी न सहते

पेड़ अगर चलते होते तो

अपने खतरे को भाँपकर

दूर कहीं मिलकर जंगल बना लेते ।

पेड़ अगर चलते होते तो

ख़ुद से वहाँ पहुँच जाते

जहाँ उनकी ज़रूरत होती ।

अभिषेक

पेड़ अगर चलते होते तो….

कितने मज़े हमारे होते

पानी देते

फल खा लेते

उन्हें सजाकर फोटो लेते

झूला झूलते

साथ में चलते

तेज़ हवा में बाँहों में भरते

अगर कभी वर्षा होती तो

इसके नीचे हम छिप जाते।

बच्चों की कल्पनाशील दुनिया में दाख़िल होने के लिए कविता का सेतु बनाया जाना मज़ेदार काम होगा जिसमें हम बड़े चलकर उनकी रंगीन, मासूम और कौतुक भरी बातों से परिचित हो पाएंगे। इस दिशा में काम हो रहा है पर पर्याप्त नहीं । आज की भागती-दौड़ती दुनिया में जब बच्चे मोबाइल और सोशल साइट्स के अंधे कुएं में गोल-गोल घूम रहे हैं ऐसे समय में अगर बच्चे कविता के प्रति राग पैदा कर पाएं तो कितनी खूबसूरत बात होगी बच्चों की कविताओं के लिए ज़रुरत होगी खाद-पानी देने की जिससे उनकी कविता की ज़मीन को विस्तार मिले और इसके लिए लायब्रेरी और सामूहिक पुस्तक पढ़ने के आयोजन महत्वपूर्ण होंगे। किताबों के प्रति राग करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर परिवार और कुछ संस्था, संगठन और सामूहिक कोशिशें हो रही हैं पर वो मुट्ठी भर है तो इस दिशा में क्या करना चाहिए सोचना ज़रूरी है । आज जब खेलने की जगहें बच्चों से छिन चुकी हैं तो उनके मनोरंजन और व्यक्तित्व विकास के लिए किताबों का स्थान छीनने से बचाने की पहल बहुत ज़रूरी है ।

नोट – ज़रा अपने क्षेत्र में देखें कि बच्चों के खेलने के लिए मैदान और लायब्रेरी की संख्या और दूरी कितनी है ।

अभिषेक और काव्या मिलकर पढ़ते हुए
नम्रता और श्रवण मिलकर पढ़ते हुए

One thought on “कविता वक्तव्य नहीं गवाह है

  • बच्चों को किताब की दुनिया में ले आना ही बड़ी उपलब्धि है. किताब की संस्कृति से परिचित हो जाने के बाद एक दूरी तक निश्चिंत हुआ जा सकता है कि बच्चे भटकेंगे नहीं, उन्हें सही दिशा मिल चुकी है.

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