कहानियों के लेंस से
जीवन देखना, बरतना और उससे आगे जाकर जीवन संवारने का हुनर सीखने के लिए कहानियों के लेंस का इस्तेमाल हम-आप नियमित करते हैं। बचपन से हर एक के जीवन में सपनीली कहानियों की दस्तक होती ही है और ये हमारी कल्पनाओं को पंख देती है। किसी बच्चे के कोमल मन के तंतु में ये खाद-पानी का काम करती हैं और मनुष्यता के मूल रंध्रों को फैलाती हैं जिससे कठिन परिस्थितयों में भी सच बोलने का, ग़लत के ख़िलाफ़ लड़ने का साहस आता है।
मूल्यों के लिए लड़ जाने का जज़्बा कोई रेडीमेड फॉर्मूला नहीं है कि हम उसे हासिल कर लें बल्कि उसे रोज़ धीरज के साथ जीने के अभ्यास में शामिल करना पड़ता है।
कहानियों के जादू से निकल यथार्थ से लड़ते ,बेहतर दुनिया का ख़्वाब बुनते हमारे समय के अनेक युवाओं की तस्वीर आँखों के आगे तैर रही है जो दुनिया में मिसाल हैं (उमर ख़ालिद, शरजील इमाम…और कई तो गुमनाम भी होंगे) इनकी लिस्ट लम्बी है और यह लिखते हुए मुझे और पढ़ते हुए निश्चित ही आपकी आँखों में भी उनकी याद चमकेगी जिन्होंने ‘मैं ‘ से निकलकर दुनिया को अपना माना और इसकी बेहतरी के रास्तों को बनाने वे मज़दूर बन गए जिनकी बदौलत हम आज़ादी की हवा में सांस ले पा रहे हैं, हम पूरे जीवन में अपना थोड़ा-थोड़ा अंश भी अगर इस जज़्बे को जीने में लगाएं तो इस दुनिया को बेहतर बनने में सदियाँ नहीं लगेंगी। परिवर्तन का चक्र तेज़ी से बदलेगा और हमें हर दिन थोड़ा और आदमियत जीने का जो जोश कायम करना पड़ता है वो हमारे सहज अभ्यास का हिस्सा हो जाएगा।
जितनी ज़्यादा मायूसी होगी उतनी ज़्यादा खुशी की चाह होगी और इसकी आस में हम अपने आसपास उन कहानियों को ढूंढते हैं जिनमें बेहतर जीवन का सपना छुपा होता है। अलग-अलग जगहों में,अलग-अलग वर्ग, लिंग-जेंडर और पहचान के लोग जूझते हुए कहानियां ही ढूंढ रहे हैं जिनकी बदौलत वे ख़ुद से और आने वाले समय से जूझ पाएं, लड़ पाएं। कहानियों के गाढ़े एहसास को हम तब शिद्दत से महूसस करते हैं जब इनसे सीधे ही वास्ता पड़ता है। हालांकि यह वास्ता बच्चों के साथ मुझे लगातार होता है पर कई बार इस वास्ते में बच्चों के जीवन की ऐसी झलकियां मिलती हैं जो सामान्य बातचीत से पता नहीं चलती।

बहरहाल इस भूमिका के आगे उस कहानी का ज़िक्र करने जा रही हूँ जो बच्चों को उनके जीवन के साथ जोड़कर देखने,अनुभव करने और आगे देखे जाने के रास्ते में ले जाती है ये कहानी प्रकाशित हुई है ‘सुपरहीरो आद्या’ साइकिल पत्रिका। यह कहानी एक ऐसी बच्ची के बारे में है जो सिंगापुर में पढ़ती है और स्कूल में होने वाले भेदभाव को लेकर स्कूल में टीचर और प्रिंसिपल के सामने सवाल उठाती है जिसके जवाब में उसे प्रिंसिपल कहती हैं कि तुम्हें एक सप्ताह दिया जाता है जिसमें आद्या को पूरे स्कूल में सभी कक्षाओं को जेंडर को लेकर संवेदनशील बनाने का टास्क मिलता है जिसे उसे बेहतर तरीके से अंजाम पहुंचाना होता है। इसके लिए वो बच्ची आद्या अपनी मां की दोस्त जो भारत में रहती हैं उनसे लगातार बात करती है और सलाह करके अपना काम करती है। आद्या पूरे स्कूल में जेंडर को लेकर मां की दोस्त का ऑनलाइन सेशन कराती है जिससे पूरा स्कूल आद्या के जैसे सवालों के जवाब प्राप्त करता है। बच्चों के लिए जेंडर संवेदना से भरी इस कहानी को पढ़कर लगा कि किस तरह से यह कहानी पूरी दुनिया के सवाल को सम्बोधित करती है। बचपन से ही जाने कितने सूक्ष्म भेदभाव से गुज़रती बच्चियां स्वयं के लिए स्पेस बनाने के लिए कितना संघर्ष करती होंगी निश्चित ही इसमें बच्चियों के साथ हर जेंडर के लोग शामिल है जो भेदभाव का शिकार होते हैं। कहानी में घटित घटनाएं और संवाद शानदार हैं कि लगता है आद्या के अनुभव तो हमारे अपने अनुभव हैं। आइए अब आप बच्चों के अनुभव को पढ़िए –
सवाल – कहानी कैसी लगी ?
गुंजन – अच्छी लगी। आद्या भेदभाव नहीं करती थी। हम लोगों को भेदभाव नहीं करना चाहिए जैसे लड़की बर्तन धोती है, कपड़ा धोती है अगर वो लड़का भी करे तो उसका मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए।
अभिषेक – आद्या बचपन से भेदभाव नहीं सीखी थी। पर कुछ-कुछ देखकर समझती थी जैसे कि स्कूल की लाइन में सब अलग-अलग क्यों खड़े होते हैं,टॉयलेट अलग-अलग क्यों बनाया गया है एक गर्ल्स का एक बॉय का और ये सब वो घर में बताती थी। आद्या अपनी मम्मी की दोस्त से बात करना चाही और सब साझा किया।आद्या अपने स्कूल को लड़का-लड़की के भेदभाव से भरा नहीं बनाना चाहती थी सब एक समान बनें ऐसा वह चाहती थी।
नम्रता – बहुत अच्छी कहानी है। यह समझ आया कि किसी के साथ कभी भी भेदभाव नहीं करना चाहिए। अपने साथ जो भी होता है उसे हमेशा खुलकर बोलना चाहिए। आद्या अपनी प्रिंसिपल मैम को भी जाकर बोली क्योंकि उसके अंदर हिम्मत थी जो कि हम लोगों के अंदर भी होनी चाहिए। यदि गलत हो रहा है तो हममे भी गलत को गलत कहने का साहस होना चाहिए।

सुरभि – इसलिए अच्छी लगी कि इतनी छोटी लड़की होने के बावज़ूद उसमें भेदभाव नहीं था। उसे लडके और लड़कियों को अलग – अलग रहना पसंद नहीं था। जो बड़े लोग नहीं कर सके वो काम आद्या ने करके दिखाया। हमें जो गलत लगता है उसे खुलकर बोलना चाहिए। हम लोग के यहां के साथ सिंगापुर में भी ऐसे होता है इसे खत्म करना चाहिए।
श्रवण – हमको समझ में आया न कि वो जो भेदभाव कर रहे थे वो नहीं करना चाहिए। आद्या को बास्केटबॉल खेलते समय हाफ पैंट पहनना था तो वो अपनी टीचर से पूछी पर उसे प्रिंसिपल मैम से पूछने के लिए कहा। वो भेदभाव अपने स्कूल में नहीं चाहती थी।

सवाल – इस कहानी को पढ़ने के बाद आप लोगों को अपने स्कूल में कौन सी बात में भेदभाव दिखाई देता है ?
नम्रता – हमको भी बिलकुल ऐसा ही लगता है कि लड़कों के लिए पेंट है और लड़कियों के लिए स्कर्ट।
गुंजन – दीदी ,तीसरी का सुशी कान का पहना तो टीचर मना कर दी। टीचर ने कहा कि तुम स्कूल आये हो कि घूमने।
सवाल – आप लोगों के साथ घर में भेदभाव होता है तो सब बच्चे एक साथ बोले कि
घर में तो बहुत भेदभाव होता है। लड़के लोग बाहर घूम रहे हैं तो ठीक है पर लड़कियां जाएं तो मुश्किल। घर के बाहर भी बैठने नहीं मिलता है। मेरा भाई घर का बिलकुल काम नहीं करता ,पानी भी नहीं लेता। हमको मार पड़ती है पर भाई को नहीं पड़ती। मम्मी हमेशा मुझे ही डांटती है।
सवाल – कोई ऐसी घटना जो तुम्हें दुखी की ?
जवाब – कल न दीदी मम्मी भाई के लिए पतंग खरीद दी तो मेरे लिए भी ली पर भाई मेरी गुड्डी भी रख लिया। एक बार मम्मी भाई के लिए खाने का लाई और मेरे लिए नहीं लाई। दूसरे बच्चे ने बताया कि एक दिन बुआ घर में थी तो मेरे पापा कुछ खाने का लाये थे उसे पूरा भाई को दे दिया।
बच्चों को यही समझा पाए कि घर के लोग नहीं समझ रहे हैं कि वे भेदभाव कर रहे हैं पर आप इसे महसूस कर रहे हैं तो आप किसी के साथ ऐसा नहीं कीजियेगा। अपने आसपास और बच्चों के साथ आप भेदभाव का व्यवहार नहीं कीजियेगा।
सच में यह बहुत तकलीफ़ भरा एहसास होता है कि हम अपने आसपास होने वाले भेदभावों को प्रत्यक्ष रूप से दूर नहीं कर सकते जिसमें शामिल होता है परिवार। परिवार की देहरी के अंदर बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में पता ही नहीं चलता और अगर चल भी जाए तो भेदभाव करने वाले व्यक्ति को आप बदल नहीं सकते।
२८ जनवरी,२०२६
समय की रफ़्तार तेज़ है इसमें आज के समय में हम कैसे गुम हो जाते हैं यह हमें पता ही नहीं चलता। ठहरकर देखने और जीने का अभ्यास कमज़ोर सा पड़ चला है पर सवाल यह भी है कि तेज़ रफ़्तार का मुकाम क्या है और हम कहाँ खड़े हैं ? बहरहाल हर एक से मिलो या फोन में बात करो सभी एक सुर में यह ज़रूर कहेंगे कि इन दिनों बहुत व्यस्त हूँ। असल में यह लिखते हुए अपनी काहिली पर नाराज़गी उतार रही हूँ। जिन का ज़िक्र है यहां उनमें मैं भी शामिल हूँ। काहिली इस बात की कि कितनी ज़रूरी और कोमल बातें दर्ज़ नहीं कर पाई जो मेरे व्यस्ततम दिनचर्या के ब्लैक होल में कहीं खो गई और इतनी व्यस्तता के बाद भी मैं खड़ी वहीं का वहीं हूँ। फिलहाल अपनी बातों को विराम देते बढ़ती हूँ बच्चों की कहानियों की दुनिया में जहां उनके साथ पहुंचकर सोचने -समझने का उनका सलीका समझती हूँ।
लम्बे समय के बाद बच्चों के साथ थी। हालचाल पूछने पर गुंजन ने कहा दीदी,आपकी बहुत याद आई। गुंजन की याद के साथ उनके प्रति मेरी भी याद जुड़ी है। बच्चे चुम्बक होते हैं जो हमें अपने साथ बांधकर रखते हैं। बच्चों से पूछा कि जब यहां नहीं थी तो क्या ऐसे काम किये जो नहीं करना चाहिए था पर तुम लोगों ने किये। बच्चे कितने मासूम होते हैं कि याद करके अपनी शैतानियों के बारे में अपनी बात साझा की। ये ईमानदारी बड़े होकर जाने कहाँ गुम हो जाती है। इस सवाल को लिखते हुए ख़ुद के लिए यह बात कौंधी कि मेरा बच्चों से किया गया सवाल होना चाहिए कि ‘जब यहां नहीं थी तो तुम लोगों ने क्या अच्छे काम किये ‘ बहरहाल यह अभ्यास मेरे लिए अब आगे का रहेगा।
गुंजन ने प्लूटो उठाई और पढ़ना शुरू किया। अभिषेक को भी साथ में शामिल कर हमने मिलकर नेफिला मकड़ी के बारे में शानदार जानकारी हासिल की। ‘न चाबी,न ताला फंसता फँसनेवाला’ विपुल कीर्ति शर्मा का छोटे बच्चों के लिए जानकारीपरक आलेख बढ़िया लगा। इसके बाद यूट्यूब में मकड़ियों का एक संक्षिप्त वीडियो देखा जिसमें विश्व की नौ खतरनाक मकड़ियों के बारे में जानकारी थी। वीडियो में एक ऐसी मकड़ी के बारे में पता चला जो रंग बदल लेती है जिसे केमोफ्लॉज कहते हैं। जैसे ही पूछा कि केमोफ्लॉज क्या होता है और साथ में कहा कि गिरगिट को जानते हो न तो जवाब उन्हें मिल गया। इस दौरान यह भी पता चला कि मकड़ी बोल और सुन नहीं सकती।
गुंजन की ख़ासियत यह है कि वो जब पढ़ना शुरू करती है तो स्थिरचित्त होकर पढ़ती है। ‘न चाबी,न ताला फंसता फँसनेवाला’ के बाद आई मुकेश नौटियाल की कहानी ‘रसोई में रीछ ‘ इस छोटी सी कहानी का पाठ अभिषेक, श्रवण और गुंजन ने किया। कहानी का शीर्षक पढ़ते साथ ही सवाल किया कि रीछ क्या होता है ? ‘भालू का एक प्रकार’ होता है यह कहकर मैंने आख़िर में वीडियो देखने की बात कही जिससे कहानी पढ़ी जा सके। बच्चों की दुनिया में जिज्ञासा और चाह के इतने झरोखे हैं कि हर झरोखे से झांककर आप उनसे संवाद करेंगे और अगले की तरफ बढ़ जाएंगे पर बच्चे जो सुर पकड़ते हैं उसे साध लेते हैं जैसे पूरी कहानी पढ़ते हुए बच्चे मुझे बार-बार यह याद भी दिलाते रहे कि दीदी ! आखिर में हमें रीछ और भालू में अंतर वाला वीडियो भी देखना है। उनकी हसरत तो रहती है कि कितना ज़्यादा दृश्य माध्यम का प्रयोग करूँ पर उसके प्रभाव और चपेट की सीमा ख़ुद को तय करनी है।

छोटी सी कहानी ‘रसोई में रीछ’ में ज़िक्र है कि जंगल में आग लगाने से शिशु रीछ घर के आँगन में आता है और भगाने की कोशिश करने पर भी वो टस से मस नहीं होता है। घरवाले अपनी दिनचर्या में लग जाते हैं और फिर अचानक देखते हैं कि एक बड़ी मादा रीछ जिसका पंजा जला हुआ है वो लगातार रसोई का दरवाज़ा पीट रही है जब वह खुलता है तो घरवाले देखकर दंग रह जाते हैं उसमें शिशु रीछ कहीं दुबककर बैठा होता है और उसने रसोई के किसी सामान को छेड़ा नहीं। वो दोनों फिर चुपचाप घर छोड़कर चले जाते हैं। कहानी के अंत में वाक्य है कि इसके बाद भी जंगल में आग लगती है पर उसके बाद रीछ कभी घर नहीं आये। इस अंतिम वाक्य में कितनी बातें हैं जिसे सोचकर दिल बैठता है कि हमारे जंगलों में अब रीछ की संख्या कम हो गई है क्योंकि जंगल भी सीमित होते जा रहे हैं। इसी क्रम में बच्चों को बताया कि रीछ / भालू की नाक बहुत तेज़ होती है। अब बच्चों की प्रतिक्रियाएं पढ़िए जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती –
गुंजन – कहानी से पता चला के रीछ दरवाज़ा भी खटखटा सकती है क्योंकि उसका बच्चा अंदर था। कहानी इसलिए अच्छी लगी क्योंकि इसके बारे में रीछ के बारे में पता चला। जब पूछे कि क्यों नहीं कोई सामान तोड़ा या उलटा – पुलटा तो जवाब मिला कि वो डरा हुआ था। उसे भगाने की कोशिश करने पर भी बच्चा वहाँ से नहीं गया। रीछ की नाक बहुत तेज़ होती है।
श्रवण – हमको यह समझ आया कि अगर कोई जानवर यहां घुस जाएगा तो पूरा हलचल मचा देगा पर रीछ के बच्चे ने रसोई में कुछ नहीं छेड़ा।
अभिषेक – ये समझ आया कि जंगल में आग-वाग लग जाती है तो सब जानवर आते हैं पर रीछ नहीं आता। हमें अभिषेक ने समझाया कि हम लोग जो सांस लेते हैं उसकी महक रीछ सूंघ लेता है, दीदी ! रीछ की नाक बहुत तेज़ होती है।
एक कहानी जिसके माध्यम से बच्चों से हम कितनी बातों पर बात कर सकते हैं यह सिखा रही है कहानियां।
अभी लिखते हुए कहानी का आख़िरी वाक्य अटक गया है कल इस पर बच्चों से बात करूंगी। फिलहाल कहानी में वन्य जीव के प्रति मनुष्यों की सहज प्रतिक्रिया ही कहानी का आकर्षण है। मां, बच्चे और गांववालों का जंगल में आग लगने से रीछ के बच्चे का घर के आँगन में आना और फिर आगे की कहानी का बढ़ना ऐसा लगा जैसे किसी पहाड़ के नीचे गाँव में अपना घर है और रीछ आ गया है। ‘रीछ की तरह तो हमारी नाक हो सकती नहीं’ इस एक वाक्य में कहानी भी है और ज्ञान भी।


बच्चों ने आख़िर में भालू और रीछ के बारे में देखा कि उनकी भौगौलिक उपस्थिति और शारीरिक बनावट के आधार पर किस तरह से नाम दिया गया है। भालू / रीछ शब्द को प्राणी जगत विज्ञान ने तय किया है जब आगे कभी मौक़ा लगेगा तो उन्हें भाषा के आधार पर संस्कृत और हिन्दी में उपस्थित समानता पर भी बात बताने की कोशिश रहेगी फिलहाल अगली कहानी की तरफ बढ़ती हूँ।

प्रभात के कहानी संकलन ‘कुतुबमीनार का पेड़ ‘ की कहानी ‘आमचोर’ पढ़ी। किसी कहानी में मूल्य जब उसके किस्से में गुंथे हों तो उसके प्रति बच्चों के विचार सुनने का आनंद अलग ही होता है। इस कहानी में एक किसान के पैर के नीचे आकर एक गिलहरी दबकर मर जाती है और वो ग्लानि से भर उठता है और गाँव में पंचों को बुलाता है पर मामूली मामला समझ वे आते नहीं है तो किसान गाँव के कुछ बुज़ुर्गों को बुलाकर अपनी बात रखता है और दंड- जुर्माने की अपील करता है। गाँव के बुजुर्ग पंच जो-जो दंड का प्रस्ताव रखते हैं वो काम मंडइया किसान पहले से कर रहा होता है जैसे छह महीने तक चिड़ियों और गिलहरियों को अनाज डालना , नीम के पेड़ में पंछियों के लिए पीने का पानी का बर्तन लटकाना। किसान कहता है बिना दंड के तो पंचायत खत्म होती नहीं है तो पंच दुविधा में पड़ जाते हैं तो एक १३ वर्ष का बच्चा कहता है कि मंडइया किसान के पांच खेत की मेड़ में एक भी आम का पेड़ नहीं है तो इन्हें आम का पेड़ लगाने के लिए कहिये। पंच तो खुश होते हैं पर मंडइया किसान कहता है कि मुझे पंच का फैसला तो मंज़ूर है पर आम का ही पेड़ क्यों लगाऊं ? तब वह लड़का कहता है क्योंकि गिलहरियों को आम का पेड़ ही सबसे ज़्यादा पसन्द है। यह तर्क वाज़िब लगता है पर कहानी का अंत होता है इस बात पर कि असल बात तो यह है कि उस लडके को ख़ुद आम खाना पसन्द आता था वह महामाचोर था। इस कहानी को कितनी ख़ूबसूरती से प्रभात ने लिखा है कि पढ़कर मज़ा आ गया। कहानी में किस तरह से किसान आत्मा ग्लानि से भर उठता है , दुखी हो उठता है कि उससे एक अपराध हो गया है , जीव ह्त्या हो गई है। भले ही किसी ने नहीं देखा है पर मुझे यह बात गाँव वालों को पंच को बतानी चाहिए और सज़ा लेनी चाहिए। आगे कहानी संग्रह कुतुबमीनार का पेड़ किताब से साभार चित्र साझा कर रही हूँ जिसे देखकर आप कहानी बेहतर समझ पाएंगे।



इस कहानी पर बच्चों की राय आई –
जो था न दीदी, क्या नाम था ,अच्छा छोड़ दीजिये ना हम नाम नहीं बता पांएगे इस वाक्य से काव्या ने कहानी के बारे में बताया –
जो किसान था न उसको जो सज़ा मिलीं जिसमें पहले चिड़िया को खाना देना था तो वो बोल दिया वो तो हम रोज़ देते हैं। फिर पानी पिलाने की बात आई तो उस पर भी कहा कि हम रोज़ देते है हैं और फिर आम की बात आई क्योंकि उस लडके को आम पसंद था। इस्मने हमको आमा चुराने वाला अच्छा लगा।
काव्या बहुत जल्दी-जल्दी बोलती है। जब कहानी पढ़ रहे होते हैं तब वो साथ में कुछ न कुछ पढ़ रही होती है जबकि अभी पूरे तरह से पढ़ना नहीं सीखी है पर कहानी सुनती रहती है।
श्रवण – वो जो था न वो गलती होने पर जाकर गाँव में सबको बताया। पंच लोग गिलहरी के मरने वाली बात जानकार नहीं आए तो वो पांच आदमी को इकट्ठा करके उन्हें बताया। हमको यह समझ आया कि वो गलती किया पर फिर भी सबको बता दिया।
बच्चों से सवाल किये कि गलती होने पर भी किसान ने सबको वो बात क्यों बताई ? तो बच्चों का जवाब मिला–
वो झूठ नहीं बोलना चाहता था।
दीदी ! झूठ बोलना पाप है।
वो बहुत दुखी हो गया था क्योंकि दो गिलहरियां खेल रही थी और अचानक से पैर के नीचे आ गई।
गिलहरी की दोस्त को दुःख लग रहा होगा इसलिए वो सोचा बता देते हैं।
वो बोलने की हिम्मत रखा जैसे हम लोग कुछ बोलने से डरते हैं न वो डरा नहीं।
इतना सुनने के बाद बच्चों को प्रेमचंद का वाक्य कहे ‘ बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात नहीं कहोगे। ‘ इसमें ईमान शब्द के अर्थ पूछने पर काव्या ने झट से कहा ईमानदारी। जो डरता नहीं है।
इस कहानी में बच्चों से पूछा कि इस कहानी में कौन-कौन से पात्र / कैरेक्टर थे तो जवाब आया -एकदम नया दूसरी में पढ़ने वाले साहिल(यह दूसरा साहिल लिटिल इप्टा में आया है ) ने सबसे पहले कहा – एक लड़का। फिर बाकियों ने जोड़ा – दो गिलहरी, चिड़िया,पत्नी,बच्चे,बूढ़े आदमी, किसान।
लिखते हुए बच्चों की आवाज़ कानों में गूँज रही होती है कि वे कितनी तत्परता से अपनी राय ज़ाहिर करना चाहते हैं। ऐसी कितनी बातें दर्ज़ नहीं हो पाती पर वे मुझे ढकेलती हैं कि डायरी से निकल वे यहाँ तक पहुंचे। इन तमाम अनुभवों के लिए उन कहानीकारों,लेखकों का शुक्रिया जो बच्चों के लिए संवेदनशील साहित्य रच रहे हैं और उन्हें गढ़ने का काम कर रहे हैं।
