बतौर दर्शक

थियेटर में असीम संभावनाएं हैं। इन संभावनाओं पर निरंतर विचार- विमर्श हो रहा है और रंगकर्मी लगातार काम कर के, पढ़ के इसे परिष्कृत कर रहे हैं। इस दिशा में दो तरह के लोग हैं पहले प्रशिक्षित और दूसरे शौकिया। दोनों ही तरह के लोग थियेटर को नित नई चुनौतियों से जूझकर इसे संवार रहे हैं।
रंगकर्म की कार्यशाला से सामान्यतः नाट्य प्रस्तुति निकलकर हम दर्शकों तक पहुँचती है। कार्यशाला की प्रस्तुति में कार्यशाला प्रशिक्षक के साथ जुड़े क्राफ्ट,वेशभूषा, संगीत, प्रकाश , बैक स्टेज से जुड़े तमाम लोग अभिनेता के साथ अपनी मेहनत झोंक देते हैं क्योंकि नियत समय में प्रस्तुति सार्वजनिक होनी होती है। इस तरह की कार्यशाला के दौरान तमाम दबावों के बावजूद सभी लोग जुटकर प्रस्तुति के साथ हो जाते हैं इस बीच उनमें एक नई केमिस्ट्री, नई बॉन्डिंग बनती है जो असल में रचनात्मक कार्यों की असल पूंजी है पर इसके उलटे सोचकर देखिये कि कार्यशाला के मूल में कार्यशाला प्रस्तुति के सार्वजनिक प्रदर्शन के दबाव से मुक्त रहकर सिर्फ ख़ुद के लिए प्रस्तुति तैयार करने की कोशिश की जाए तो इस तरह के प्रयोग में कौन सी संभावनाएं होंगी और चुनौतियां होंगी। बहरहाल दोनों तरह की कार्यशाला अंततः रंगकर्मियों को मांजने और स्वयं से संवाद करने और तराशने की तरफ ही ले जाती है।

रंगकर्म की कार्यशाला में अनेक प्रयोग हो रहे हैं जिनमें युवा रंगकर्मी अपनी कल्पनाशीलता और ऊर्जा को कुछ नया पाने और आकर देने की कोशिश कर रहे हैं। संसाधन संपन्न क्षेत्र में इस तरह की कार्यशाला को करना आसान होता है बनिस्बत छोटी जगहों में जहां अभी कार्यशाला के लिए रंगकर्मी को जुटाना भी एक बड़ा काम होता है। छोटी जगहों में पूरावक्ती रंगकर्मी नहीं मिलते क्योंकि उससे उनका जीवन चल नहीं सकता, ये एक पक्ष है जिस पर एक लगातार रंगकर्मियों के बीच चर्चा – विमर्श होता है पर इसका परिणाम उम्मीद भरा आज के समय में नहीं है। बहरहाल इस भूमिका के बाद अब उन रंगकर्मियों की बात करने जा रही हूँ जिन्होंने ६ दिवसीय आवासीय कार्यशाला ‘शीतरंग ‘ का आयोजन किया।
‘शीतरंग’ मस्कल थियेटर एंड आर्ट की पहल थी जिसे २४ से २९ दिसंबर,२०२५ को प्रकृति की गोद में बसे चाकुलिया गाँव में स्थित सोबरन स्मृति शिक्षापीठ में सीमित संसाधनों के साथ पूरा किया। इसमें विभिन्न जगहों के, विभिन आयुवर्ग के १५ प्रतिभागी शामिल हुए। जिनमें स्कूल -कॉलेज जाने वाले विद्यार्थी और पढ़ाई पूरा करके शौकिया थियेटर करने वाले और सामाजिक काम करने वाले लोग भी सम्मिलित हुए और यही किसी कार्यशाला की खूबसूरती होती है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि से आये लोगों को संवाद और दोस्ती का स्पेस मिलता है और अपने समाज को परिवार की धुरी से निकलकर समझने की सलाहियत भी पनपती है।
कार्यशाला का आइडिया युवा अनुभवी रंगकर्मी, शोधार्थी ज्ञानदीप और एन एस डी प्रशिक्षित सुमन पूर्ति का रहा जिसे उन्होंने झारखंड की आबो-हवा को देखते हुए डिजाइन किया। इनके अलावा छत्तीसगढ़ से एन एस डी पास आउट भुनेश्वर,प्रशिक्षित युवा रंगकर्मी में जमशेदपुर से प्रेम शर्मा,प्रदीप रजक,अंकुर शाष्वत और विकास कुमार प्रशिक्षक की भूमिका में रहे।

शीतरंग के छठे दिन कार्यशाला में सम्मिलित हुए रंगकर्मियों की तैयार की गई प्रस्तुतियां स्वयं के लिए थी जिसमें बतौर दर्शक शामिल होने का अवसर मिला। इससे पूर्व यह बताया जाना ज़रूरी है कि कार्यशाला का आयोजन जिस स्पेस में किया गया था वो अपने आप में अनूठा है। दलमा से सटे चाकुलिया गाँव में आकार लेता सोबरन शिक्षा पीठ अपने आसपास कुदरत की ख़ूबसूरती समेटे हुए है। नियमित रूप से शोरोगुल से भरी दुनिया से दूर ६ दिन अपने को खोज पाने और कुछ पाने की पहली सीढ़ी प्रकृति की गोद हो सकती है ये हम सभी जानते हैं और इस खोज को रचनात्मक ढंग से पूरा किया मस्कल थियेटर ने।
मात्र छह दर्शको के बीच अलग-अलग स्पेस में डिवाइस कार्यशाला की प्रस्तुतियां बढ़िया रही। अलग स्पेस होने के बावज़ूद वे सब कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़ी थी। इस तरह की प्रस्तुतियों के बारे में पढ़ा ज़रूर पर चार स्पेस में देखने का अवसर पहली बार मिला। उन प्रस्तुतियों पर कार्यशाला के प्रतिभागियों के साथ छह दिन तक चली गतिविधियों की झलक मिल रही थी साथ ही उनके अपने आप को टटोल पाने ,समझ को समझने की बेचैनी और उसे साकार करने का माध्यम बना उनकी प्रस्तुति।
जैसा कि कार्यशाला के अंतिम दिन एक बेचैनी और जल्दी – जल्दी कुछ पूरा करने की गति दिखाई देती है वो इस स्पेस में दृश्य रूप में ज़रूर अनुपस्थित थी जबकि सच कहा जाए तो ऐसा होता नहीं है। शान्ति से सभी कलाकार और प्रशिक्षक ज़रुरत के अनुसार अपनी तैयारियों में मगन थे। चार स्पेस में प्रस्तुति का मौन मुखर होने को आतुर दिखा पर यह इंतज़ार हम दर्शकों के लिए लंबा था। हम पहुंचे शाम साढ़े चार बजे और उसके बाद घुप्प अँधेरा होने के बाद तीसरी घंटी बजने पर हम छह दर्शक पहले स्पेस से सफ़र शुरू किये।

सोचिए ! आपकी विचार-प्रक्रिया में जब कोई अवरोध आता है तो कितना तेज़ झटका लगता है और हम झुंझलाहट से भर उठते हैं क्योंकि हम असहाय महसूस करते हैं। बस यही एहसास हर एक पड़ाव में और गाढ़ा हुआ, सघन हुआ। आख़िर हमारे समाज में बनाई तमाम दुश्चिंताओं को ढोता हुआ एक आम शख़्स चैन से कैसे रह सकता है और इस बेचैनी को एक तरफ जिया कलाकारों ने और दूसरी तरफ बतौर दर्शक की हैसियत से हमने भी। अपने परिवार, चौक-चौराहों,गाँवों-शहरों से विस्तार पाती हमारी ज़िंदगी के एक-एक पहलू पर पसरे मातम और ग़म की काली सटीक लकीर में सिमटे थे प्रस्तुति के ये चार स्पेस। धर्म-जाति,वर्ग-लिंग में बंटे समाज की साफ़-स्पष्ट झलक थे ये स्पेस। कड़वी सच्चाई में कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं थी कि होंठों पर मुस्कराहट तैर जाए। आख़िर कैसे समय और समाज में हम रह रहे हैं इसकी मिसाल रखी कार्यशाला के कलाकारों ने।

बार-बार चार स्पेस की बात कर रही हूँ जिसमें कार्यशाला स्पेस के आसपास के स्थान चयनित किये गए थे। वे अपने आप में एक दृश्य थे जिन्हें अपनी प्रस्तुति की बात/ सच्चे किस्से में जोड़ा चार अलग-अलग टीम ने। सीमित संसाधनों में किस तरह से थियेटर का काम प्रभावशाली हो सकता है इसकी समझ आज के समय में महत्वपूर्ण है जब थियेटर को दूर-दूर तक ले जाने के लिए हमारे पास संसाधन नहीं पर माद्दा है तभी संभव हुआ शीतरंग।
कलाकारों का ख़ुद से बात करना, अपने आसपास के मौन के साथ शोर के अनुभव के साथ अपने आपको खोजना और उसमें से संवेदना के उन तत्वों का चयन जिसमें हम सच की आभा में बस थोड़ा प्रकाश , थोड़ा संगीत और थोड़ा नाटकीय तत्त्व मिलाकर प्रस्तुति करें तो उसमें खरापन महसूस होगा ही। रचनात्मकता और कल्पनाशीलता के लिए जज़्बे को जगाया प्रशिक्षकों ने जिसके बूते तमाम कलाकार अपने समय और समाज की नब्ज़ पकड़कर ऐसी प्रस्तुतियां दिए जिनमें स्थानीयता से राष्ट्रीयता, जल – जंगल – ज़मीन से बेदख़ली और पहचान का संकट, सत्ता का गठजोड़, पर्यावरण और मीडिया सब कुछ इस तरह से आया जैसे बहते पानी में करंट आया और आप उस करंट से छटपटाते बहते चले गए और बचने के लिए आवाज़ गले में ही दब गई।

इन प्रस्तुतियों को निकाल पाने का माद्दा आसान नहीं रहा होगा जब कुछ कर पाने , प्रयोगशील होने का जज़्बा हो तो इस तरह का काम होता है। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि इस तरह के प्रशिक्षण से प्रतिभागी सिर्फ छह दिन के लिए ही नहीं बल्कि हमेशा के लिए उन आवाज़ों के साथ चलेंगे जिसकी आवाज़ आज तक वे अनसुनी किये और एक ज़िम्मेदार संस्कृतिकर्मी बनाने की दिशा में नई पहचान बनाएंगे।

